शाहीन बाग की दादियों चिंता जितनी ‘भक्तों’ को है उतनी किसी को नहीं

शाहीन बाग की धरनाधारी महिलाओं को लेकर कोई सबसे ज्यादा चिंतित है तो वो भक्तगण हैं. लगातार वो इस बात को लेकर चिंतित हैं कि महिलाएँ धरने के चक्कर में फंस चुकी हैं और सारी की सारी चिंता और विमर्ष इन महिलाओं की फिक्र के रूप में सामने आ रहे हैं.

दो महीने में ये पक्का हो चुका है कि समस्या न तो सीएए है न एनआरसी. समस्या ट्रैफिक जाम है. जाहर बात है कि सारे हथकंड़े फेल होने के बाद फिर से पुराना मोर्चा संभाला गया वही पुराना ट्रैफिक की समस्या का राग शुरू हो गया. अब कह रहे हैं कि आंदोलन होना चाहिए लेकिन लोगों को परेशानी गलत है.

भक्तों ने पहला आंदोलन ढूढ निकाला है जिससे जनता को परेशानी हो रही हो. अदालत में वकीलों की हड़ताल होती है तो लोगों को परेशानी नहीं होती. अस्पतालों में डॉक्टरों की हडताल होती है तो मरीजों की परेशानी नहीं होती. चक्काजाम होता है तो लोगों को परेशानी नहीं होती . आरक्षण विरोधी आंदोलन होता है तो लोगों की जिंदगी मक्खन हो जाती है. एक साहित्यिक चरित्र पर फिल्म बनती है तो चुनाव तक तरह तरह से लोगों को परेशान किया जाता है. तोड़फोड़ बंद बगैरह होते हैं तो लोगों को परेशानी नहीं होती. लेकिन चर्चा का विषय धरना नहीं है. सीएए नहीं है . परेशानी है.

आपको याद होगा कि धरने को 15 दिन भी नहीं हुए थे कि प्रेरक संस्था सोशल मीडिया सेल ने चिंता का विस्तार देने के लिए मसाला दिया. कहा गया कि अगर धरनाधारी नहीं हटे तो जनता उनके खिलाफ हो जाएगी. लेकिन धरना नहीं हटा. वो चलता रहा. बड़ा होता गया. इसके साथ साथ ही चिंता भी बड़ी होती गई. जो समस्या ट्रेफिक की थी वो राष्ट्रीय समस्या बन गई. समस्या ये कि हटाए न हटे.

कहा जाने लगा कि शाहीन बाग में पैसे बंट रहे हैं. बिरयानी बंट रही है. यहां सिखों ने लंगर लगाया था उसे भी पुलिस ने हटा दिया. सोचा अब तो पक्का धरना हट जाएगा. कोशिशें जारी रहीं देश भर के मंत्री आए, पीएम आए, गृहमंत्री आए. 250 सांसद आए. बीजेपी के योद्धा आए. सोशल मीडिया सेल के 2500 लोग लगे. इस टीवी और प्लेग से बड़ी ट्रेफिक जाम की समस्या पर बौद्धिक देने लगे. और तो और कई चौधरी और चौरसियां वहां पहंच गए ताकि इस टैरिरस्ट कनैक्शन का पर्दाफाश अपने विचारों से कर सके. एक जासूस भी भीड में हिडन कैमरा लेकर घुसी और पकड़कर वाहर आ गई. कोई देश अपने जासूस से संबंध स्वीकार नहीं करता है तो उससे भई बीजेपी ने नही स्वीकारा,

जनता को परेशानी हो रही थी. उस परेशानी को शायद कोई न समझ रहा हो इसलिए इसे राष्ट्रीय समस्या बना दिया गया. कहा गया यहां टैररिस्ट फंडिंग है. योगी जी ने दो महीने पहले ही सीएए आंदोलन से घबड़ाकर जिस संगठन को प्रतिबंधित किया था उससे संबंध जोड़ा जाने लगा. कहा गया कि 8 तारीख के बाद सब उठ जाएंगे. परेशानी जबरदस्त थी आखिर देश की जनता पहली बार परेशान जो हो रही थी. इसके बाद चुनाव आए.

जनता परेशान थी तो उसकी तरफ से कुछ धमाका होने की अपेक्षा में भक्तगण बैठे रहे. दिमाग में पक्का था कि ओखला के लोग परेशान हैं तो वो पक्का बीजेपी के साथ खड़े हो जाएंगे लेकिन हुआ उल्टा. ट्रैफिक जाम झेल रहे लोगों ने वोट भी जाम लगाने वाले विधायक को दे दिया. वोट शाहीन बाग के साथ गया. पता चला कि शाहीनबाग का धरना आतंक का गढ़. बलात्कार की घात में बैठी भीड़. चुनावी जमावड़ा जैसा कुछ नहीं है.  

इसके साथ ही अब भक्तों को इंतजार था कि धरना पक्का हट जाएगा. क्योंकि सोशल मीडिया सेल ने कहा था कि आठ तारीख के बाद सब चले जाएंगे. मोबाइल फोन पर अंगूठे तने हुए थे . मन में विश्वास था कि धरना चुनावी है अब हट ही जाएगा. वाट्सएप यूनिवर्सिटी के हर प्रोफेसर ने यही कहा था. कि धरना तो हटना ही है. लेकिन ये क्या. अंगूठे इंतजार करते रहे. लेकिन कुछ नहीहुआ.

इस बीच सोशल मीडिया पर आश्वासन आया. कहा गया कि हटना चाहते हैं लेकिन हट नहीं पा रहे . उनको समझ में नहीं आ रहा कि कैसे हटें. सुप्रीम कोर्ट में केस आया तो उम्मीद बंधी कि अब कोर्ट इनको उठाकर फिंकवा देगा. उन्को लगता था कि सुप्रीम कोर्ट भी वहीं से पढ़ा लिखा होगा जहां से संसद में खबरें कोट कर दी जाती हैं या जहां से भक्तगण ज्ञान लेते हैं. वही वाट्सएप यूनिवर्सिटी. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. कोर्ट ने तो असहमति को सम्मान दिया मध्यस्थ भेज दिए. कहा गया कि बातचीत हो. इस बीच पुलिस ने धरने के कारण आवागमन बंद होने की कहानी को पक्का करने के लिए दूसरी तरफ की जो सडक बंद कर रखी थी उसे खोल दिया गया. हर तरफ ट्रैफिक की बहार आ गयी. लेकिन थोड़ी देर बाद समझ में आया कि अगर सड़क खाली हो गई तो थूथू होगी. लोग पूछेंगे दो महीने से क्यों नहीं खाली की. एक घंटे में ही फिर से पुलिस वाले हिस्से की रोड बंद कर दी गई.

लेखक गिरिजेश वशिष्ठ आजतक के वरिष्ठ पत्रकार हैं . ये लेख सोशल मीडिया पर उन्होंने निजी हैसियत से पोस्ट किया है