शराब के प्याले में गर्त होता लोकतंत्र, पत्रकार गिरिजेश वशिष्ठ का लेख

दीपक चौरसिया का शराब पीकर एंकरिंग करना समाचार माध्यमों के अंगंभीर हो जाने और पत्रकारिता जैसे जिम्मेदार काम के महत्व को न समझने के तौर पर देखा जा सकता है लेकिन ये मामला इतना सरल और सीधा नहीं है. मामला है लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के तौर पर स्थापित एक बैलेंसिग फोर्स का कमजोर जो जाना.

लेखक गिरिजेश वशिष्ठ , नॉकिंग न्यूज डॉट कॉम के सलाहकार संपादक हैं.

पिछले कुछ सालों में लगातार हमने देखा कि किस तरह वो सभी संस्थाएं और व्यवस्थाएं तेजी से कमजोर की गईं या कमजोर हुई जो सरकार की शक्ति को संतुलित करती थीं और उसे बेलगाम होने से रोकती थी.

इन संस्थोओं में भले ही चुनाव आयोग हो. न्याय पालिका हो, सीएजी हो, विपक्ष हो, गैर सरकारी संस्थाएं हों. प्रेशर ग्रुप हों या कोई और संस्था जो लोकतंत्र को लोकतंत्र बानती है.

इन सालों में लगातार ये संसथाएं या .तो सरकार के दबाव में आकर उसके व्यवहार करने लगीं या फिर आवाज खोलने पर उनकी छवि मलिन करने का अभियान छेड़ दिया गया.

जब ये संस्थाएं सत्तातंत्र की गोद में खेलने लगती तो इन पर दूसरी तरफसे हमले तेज होते अगर नहीं खेलती तो सत्तातंत्र और उसका सूचना तंत्र उन्हें बदनाम करना शुरू कर देता. हमने देखा कि जब दबाव समूह जब अपना काम करने लगे तो सरकार ने सत्ताधारी पार्टी के तंत्र और सोशल मीड़िया नेटवर्क का उपयोग उसकी छवि मलिन करने में किया. किसान आंदोलन इसका ताजा उदाहरण है. इस आंदोलन को देश विरोधी करार दिया गया. कभी कहा गया कि ये राजनीतिक हितों से प्रेरित है. यही सीएए वाले आंदोलन के साथ हआ.

लेकिन इसका सबसे बड़ा नुकसान लोकतंत्र को हो रहा है विधायिका में अधिनायकवाद बढ़ रहा है. विपक्ष कमजोर होता जा रहा है. मीडिया की छवि मलिन कर दी गई है. कार्यपालिका गुलामों वाली हालत में है यहां तक कि पार्टिय़ां भी कुछ नेताओं के सामने बेहद कमजोर हालत में नजर आती हैं. कांग्रेस पार्टी राहुल गांधी के बगैर शून्य सी दिख रहीहै और बीजेपी मोदी के बगैर.

एक तरीके से देखा जाए तो लोकतांत्रिक ढांचा कमजोर  हो रहा है और कुछ नेता पूरे सिस्टम को नियंत्रण में ले चुके हैं. यानी लोकतंत्र के तंबू को थामे रखने वाली सभी डोरिया कमजोर पड़ती जा रही हैं.

ऐसे में दीपक चौरसिया जैसे कांड होते हैं तो पहले से ही साख के संकट से गुजर रहा मीडिया एक और गहरे संकट में फंसता नजर आता है. बात दीपक चौरसिया की नहीं है. उनके जैसे कई पत्रकार पत्रकारिता को पहले ही सरकार के चरमों में डाल चुके हैं. मीडिया संस्थान ऐसे ही पत्रकारों के सामने लाचार नजर आते हैं  और इन्हें इसलिए महत्व देते रहते हैं क्योंकि ये सरकार से संस्थानों के लिए व्यावसायिक उपलब्धियां जुटाने का काम करते हैं. इनमें कई रिपोर्टर और संपादक ऐसे हैं जिन्होंने पिछले दस साल में एक भी बड़ी खबर नहीं की है फिर भी अपने अपने संस्थानों में बेहद मजबूती से जमे हुए हैं. आप गोदी मीड़िया कहें या बिकाऊ मीडिया या फिर बेवड़ा मीडिया नुकसान लोकतंत्र का होता है. जब लोकतांत्रिक और संवैधानिक संस्थाएं कमजोर पड़ती जाएंगी तो सत्ता तंत्र बेलगाम हो ही जाएगा. कहीं हम ये सब करके तानाशाही के लिए रास्ते तो नहीं खोल रहे हैं.