फैज़ अहमद फैज़ कौन हैं, जान गए तो शायद शर्म आ जाएगी सरकार पर

हम देखेंगे

लाज़िम है कि हम भी देखेंगे

वो दिन कि जिस का वादा है

जो लौह-ए-अज़ल में लिख्खा है

जब ज़ुल्म-ओ-सितम के कोह-ए-गिराँ

रूई की तरह उड़ जाएँगे

हम महकूमों के पाँव-तले

जब धरती धड़-धड़ धड़केगी

और अहल-ए-हकम के सर-ऊपर

जब बिजली कड़-कड़ कड़केगी

जब अर्ज़-ए-ख़ुदा के काबे से

सब बुत उठवाए जाएँगे

हम अहल-ए-सफ़ा मरदूद-ए-हरम

मसनद पे बिठाए जाएँगे

सब ताज उछाले जाएँगे

सब तख़्त गिराए जाएँगे

बस नाम रहेगा अल्लाह का

जो ग़ाएब भी है हाज़िर भी

जो मंज़र भी है नाज़िर भी

उट्ठेगा अनल-हक़ का नारा

जो मैं भी हूँ और तुम भी हो

और राज करेगी ख़ल्क़-ए-ख़ुदा

जो मैं भी हूँ और तुम भी हो

इस नज्म की इन दो लाइनों से पाकिस्तान के बाद अब भारत की हुकूमत भी खौफज़दा हो गईलगता है. लाइनें इसी नज़्म से हैं. लाइनें हैं…

‘बस नाम रहेगा अल्लाह का

जो ग़ायब भी है हाज़िर भी’

उपर लिखी नज़्म ‘हम देखेंगे’ की इन लाइनों को लेकर IIT कानपुर ने जांच बैठाने की बात कही है. आरोप लगाया गया है कि फैज़ की ये पंक्तियां हिंदू विरोधी हैं. फैज़ की गिनती उन शायरों में होती है, जिन्होंने पाकिस्तान की हुकूमत के खिलाफ हल्ला बोला था, आज की पीढ़ी भले ही उनसे इतना वाकिफ ना हो लेकिन कविता-शायरी के जानने वालों से लेकर सोशल मीडिया की गलियों तक में उनके शेर हमेशा जिंदा रहते हैं. इसी बीच जानिए कि फैज़ अहमद फैज़ कौन थे और कैसे वो हिंदी-उर्दू पट्टी के बेमिसाल शायर बन गए.

फैज़ अहमद फैज़ का जन्म 13 फरवरी, 1911 में पंजाब के नरोवल जिले में हुआ था. देश का बंटवारा हुआ तो ये हिस्सा पाकिस्तान में चला गया. फैज़ पत्रकार रहे, शायर भी थे और उन्होंने ब्रिटिश आर्मी में बतौर फौजी सेवाएं भी दीं. उन्होंने जब शायरी या गज़ल लिखना शुरू किया तो उनकी कोशिश दबे-कुचलों की आवाज को उठाना ही था, यही कारण रहा कि उनकी लेखनी में बगावती सुर ज्यादा दिखे.

भारत-पाकिस्तान बंटवारे के बाद फैज पाकिस्तान में रह गए. अपनी शायरी के जरिए फैज़ ने पाकिस्तान की हुकूमत के खिलाफ आवाज़ उठानी शुरू कर दी, जो सिलसिला आखिर तक चलता रहा. बंटवारे के बाद उन्होंने एक स्थापित सरकार की बात की और 1951 में ही लियाकत अली खान की सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया, जिसकी उन्हें सज़ा भी मिली. अपनी शायरी और लेखनी की वजह से उन्होंने दुनिया को शांति का संदेश दिया, इसके लिए उन्हें नोबेल शांति पुरस्कार के लिए नॉमिनेट भी किया गया. फैज़ को सोवियत संघ द्वारा लेनिन शांति पुरस्कार भी दिया गया.

आजादी मिलने के वक्त उन्होंने बंटवारे का जो दर्द देखा, उस पर ‘सुबह-ए-आजादी’ नाम की अपनी नज्म में लिखा-

ये दाग़ दाग़-उजाला, ये शब-गज़ीदा सहर

वो इंतज़ार था जिसका, ये वो सहर तो नहीं…

पाकिस्तान जब भारत से अलग हुआ तो वहां पर राजनीतिक उथलपुथल मची हुई थी. लियाकत अली खान पाकिस्तान के प्रधानमंत्री बने लेकिन कुछ ही समय के बाद उनके खिलाफ साजिश भी शुरू हो गई. 1951 में उनके तख्तापलट की साजिश का खुलासा हुआ तो काफी नेताओं, पत्रकारों की गिरफ्तारियां हुईं. इनमें फैज़ अहमद फैज़ भी शामिल थे, जिनपर आरोप था कि वह कुछ लोगों के साथ मिलकर पाकिस्तान में वामदलों की सरकार लाना चाहते हैं.

1951 में गिरफ्तार किए गए फैज़ अहमद फैज़ को चार साल जेल में रखा गया, 1955 में वह बाहर आए. हालांकि, इसके बाद भी उनका लेखन जारी रहा और उन्होंने हर आरोप को झूठा करार दिया. इसी के बाद उन्हें देश से निकाल दिया गया, कई साल उन्होंने लंदन में बिताए और करीब 8 साल के बाद पाकिस्तान वापस लौटे.

फैज को पाकिस्तान की हुकूमत ने जेल में डाला तो उन्होंने वहीं से रूमानी और इंकलाबी दोनों तरह की शायरी को लिखना जारी रखा. इसके बाद उनके जेल से लिखने पर रोक लगा दी गई. बाद में उनकी जेल में लिखी रचनाएं ‘जिंदान नामा’ और ‘दस्त-ए-सबा’ नाम की जिल्दों में आईं. बता दें कि जब फैज जेल में थे तो पाकिस्तान के अखबारों और आम लोगों के बीच यह चर्चा आम थी कि फैज को फांसी हो जाएगी, हालांकि उन पर लगे आरोप साबित नहीं हो सके और उन्हें रिहा किया गया.

फैज़ अहमद फैज़ के जुल्फिकार अली भुट्टो के साथ अच्छे संबंध थे, जब वह विदेश मंत्री बने तो उन्हें लंदन से वापस लाया गया. इसके बाद पाकिस्तान में उन्हें कई बड़ी जिम्मेदारियां दी गईं, जिनका संबंध लिटरेचर से था. उन्हें कल्चरल एडवाइज़र भी बनाया गया. लेकिन जब 1977 में तत्कालीन आर्मी चीफ जिया उल हक ने वहां तख्ता पलट किया तो फैज़ अहमद फैज़ काफी दुखी हुए. इसी दौरान उन्होंने ‘हम देखेंगे’ नज़्म लिखी, जो जिया उल हक के खिलाफ था. इस दौरान वह कुछ समय के लिए लेबनान भी गए लेकिन 1982 में वापस आ गए, 1984 में फैज़ अहमद फैज़ का लाहौर में निधन हो गया.

फैज अपने जाने के बाद और भी ज्यादा पढ़े गए. फैज एशियाई मूल के उन शायरों में शुमार हैं जिन्हें दुनिया भर में सबसे ज्यादा पढ़ा गया है. उनकी जिस नज्म पर हिंदुस्तान में सवाल हो रहे हैं वह नज्म उनकी मौत के एक साल बाद पाकिस्तान में बगावत और प्रतिरोध का नारा बन गई थी. 1985 में जब पाकिस्तान के तत्कालीन सेना प्रमुख जनरल जियाउल हक ने देश में मार्शल लॉ लगा दिया था और इस्लामीकरण के चलते देश में महिलाओं के साड़ी पहनने पर भी पाबंदी थी तब लाहौर के स्टेडियम में एक शाम पाकिस्तान की मशहूर गजल गायिका इकबाल बानो ने 50 हजार लोगों की मौजूदगी में ‘हम देखेंगे’ नज्म को गाकर इसे अमर कर दिया था. तब से लेकर आज तक इसे हिंदुस्तान और पाकिस्तान दोनों मुल्कों के कई गायक अपनी आवाज दे चुके हैं.

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