पत्रकार ने कहा आंखें खोलने का वक्त, ये पोस्ट आपकी सोच बदल देगी

समाचार या खबर कोई मनोरंजन नहीं होती. वो कोई तमाशा या सिनेमा भी नहीं होता और काल्पनिक कहानी भी नहीं होती. ये वो सच होता है जो हमारे आसपास घट रहा होता है. वो अपने जीवन में भविष्य की आहट और वर्तमान के परिवर्तन इन समाचारों में महसूस नहीं करते.

हर खबर और कहानी उन्हें सिर्फ किस्सा लगती है. खबरें कई हैं लेकिन शुरू करते हैं इस खबर से. एक दबंग के एक लड़की के साथ रेप करता है. उसके खिलाफ कोई एक्शन नहीं होता. सरकार बचाती रहती है. उसके पिता को पुलिस उठा लेती है. न्यायिक हिरासत में मतलब कोर्ट के कब्जे में जब वो आदमी होता है उसकी हत्या कर दी जाती है क्योंकि उसने आवाज उठाई थी. पीड़िता की बहन मुख्यमंत्री के दफ्तर के बाहर खुद को आग लगाने की कोशिश करती है. मीडिया में मामला आता है. दूसरे राज्य में मुकदमा चलता है. बलात्कारी को फांसी की सजा मुकर्रर होती है. इसी अपराधी से जेल में मिलने सत्ताधारी पार्टी का सांसद जाता है. उसका आशीर्वाद लेता है. और आप इसे किसी थ्रिलर कहानी की तरह लेते हैं. आप नहीं सोचते कि बेटी तो आपकी भी है. आपको वो कहानी लगती है. किस्सा लगता है. आप सोचते ही नहीं कि ये मेरे देश में जो हो रहा है वो मेरे साथ भी हो रहा है. कल आपके साथ होगा तब दूसरे लोग मनोरंजन की तरह लेंगे और जालिमों का काम ऐसे ही चलता रहेगा. क्या ऐसे ही चलना चाहिए.

1857 में जब भारत के 72 साल के बादशाह बहादुर शाह ज़फर को गिरफ्तार करके अंग्रेज रंगून ले जा रहे थे तो हज़ारों लोग कोलकाता में तमाशा देख रहे थे. खुद अंग्रेज़ों ने लिखा है कि एक आदमी अगर एक पत्थर भी मारता तो हालात कुछ और होते.

भारत का सत्य के प्रति साक्षीभाव दुखद है. यही बहादुर शाह ज़फर जब रंगून अब यांगून में दफनाए गए तो वहां करीब 100 लोग थे. अंग्रेज अधिकारी डेविड लिखते हैं कि ये लोग वैसे ही सैर सपाटे के लिए आए थे जैसे कि घुड़दौड़ देखने आए हों.

ईरान के आर्मी चीफ को अमेरिका अगर एक मिसाइल के ज़रिए उड़ा देता है तो हम उसे दूर का एक किस्सा भर समझते हैं. हम नहीं सोचते कि अमेरिका जैसे देशों की दादागीरी के आगे हमारे जैसे मुल्क कितने लाचार है. वो अपने आर्थिक हितों के लिए हमारे देश पर किस तरह के दबाव डालता होगा और उससे भी बढ़कर हमारे देश की हर नीति का हमारे जीवन पर क्या असर पड़ता होगा. देश की कुल आमदनी का 18 फीसदी सीधे विदेशी कर्ज के ब्याज पर सरकार चुकाती है. ये ब्याज कोई खुशी खुशी नहीं लिए जाते वो किसी देश को गुलाम बनाकर रखने की तरकीब का हिस्सा होते हैं.  लेकिन इस पर फिर कभी. हम कल्पना कर सकते हैं कि अमेरिका की हां में हां न मिलाई तो कभी भी हमारे नये नये बने रक्षा प्रमुख रावत साहब को उड़ाने की कोशिश भी सकता है. अमेरिका न तो जज है न दिव्य पुरुष अमेरिका और भारत के हित अलग अलग  हो सकते हैं और वो जो ईरान के साथ कर सकता है वो हमारे साथ भी करने की कोशिश कर सकता है. लेकिन हम इस सबसे चिंतित नहीं होते.

हाल में खबर आई है कि एक पार्टी किसी राष्ट्रीय नीति पर रायशुमारी कर रही है तो तरह तरह के अजीब हथकंडे अपनाए जा रहे हैं. कोई कह रहा है कि ये फिल्म अभिनेत्री आलियाभट्ट का नंबर है डायल करो तो कोई फ्री सैक्स के लिए उस नंबर को प्रचारित कर रहा है. नेट फ्लिक्स की मुफ्त सेवाएं देने के नाम पर भी नंबर को प्रचारित किया जा रहा है. आपको लगता है ये मनोरंजक समाचार है. लेकिन आप नहीं जानते कि आप भले ही इसे कहानी किस्से की तरह देखकर आनंदित हो रहे हों लेकिन इसके जो नतीजे होंगे उनमें आपकी भी सहमति मानी जाएगी. आप फिर उसे भी मनोरंजन की तरह एक कान से सुनेंगे दूसरे से निकाल देंगे.

एक नेता संसद में कुछ और बोलता है. कैबिनेट की बैठक में कुछ और बोलता है और फर  रर

आपके पास आकर कुछ और भाषण देता है तो आप इसे एक कौतुक समझकर नजरअंदाज़ कर देते हैं. आप सोचते ही नहीं है कि कोई आपके पास आकर रोज तरह तरह के झूठ परोस रहा है तो उसका मकसद क्या होगा. क्या आप अपने किसी बंधु बांधव या किसी कर्मचारी के इस तरहके आचरण पर भी ऐसे ही प्रतिक्रिया देते हैं. यहां तो वो व्यक्ति छल कर रहा है जिसके हाथ में आपकी किस्मत है. आपका भविष्य है. आप उस प्रपंची के प्रपंच पर ध्यान ही नहीं देना चाहते. आपको नहीं लगता कि ऐसे लोग अपने जीवन में होते तो आप उन्हें निकाल बाहर करते क्योंकि आप नहीं जानते कि वो आपकी पीठ में कब छुरा घोंप देंगे. वो झूठ बोलते हैं आप उनके झूठ को दोहराते हैं. बाद में आप झूठे साबित होते हैं लेकिन आपको इससे कोई फर्क ही नहीं पड़ता. क्योंकि आपके लिए दुनिया एक कहानी है.

एक राज्य से रोज खबरें आ रही है कि एक ही शहर में दस हजार लोगों के खिलाफ एफआईआऱ दर्ज कर दी गई है. बिना जाने कि वो कौन लोग थे. 82 साल के बुजुर्ग जो कि अस्पताल में भर्ती है बलवाई बताए जा रहे हैं. पुलिस गोलियों से लोगों की जान ले लेती है . सरकार कहती है गोलियां चली ही नहीं. बाद में सच सामने आता है. सरकार आंख बंद करके धर्म और धर्म  में भी गरीब देख देख कर लोगों पर मुकदमे लाद रही है. उन्हें जेल भेजा जा रहा है. उन लोगों पर भी केस है जो देश में है ही नहीं कोई हज करने गया है तो कोई दूसरे शहर में है. लेकिन आप इसे सिर्फ या तो कहानी किस्से की तरह देखना चाहते हैं या फिर इस तरह आनंद ले रहे हैं जैसे आपकी फेवरिट फुटबॉलर ने नजर बचाकर कोई बेईमानी कर ली हो और गोल मार दिया हो. ऐसे देख रहे हैं जैसे कि आपकी पसंदीदा टीम के बॉलर की नो बॉल घोषित ही न की गई हो.

ये मनोरंजन नहीं है. ये जीवन है. जिनके खिलाफ मुकदमा हुआ है वो आपके चचा भी हो सकते थे. आपके नहीं तो आप जैसे किसी और के चचा तो वो ज़रूर रहे होंगे. धर्म छोड़ भी दें तो एक झूठी वीडियो पर जेल में डाल दिए गए लोगों के किस्से भी अनगिनत है. पता नहीं किसके भाई और बच्चों को जेल में डाल दिया गया क्योंकि सरकार में बैठा उसका मुखिया उन्हें जानता भी नहीं फिर भी उनसे नफरत करता है.

ये वो राज्य है जिसमें गरीब घरों के 700 से ज्यादा बच्चों को अपराधी बताकर पैर में गोली मार दी जाती है. आपको लगता है फिल्म की पटकथा है. पुलिस कहती है उस पर 25 हजार या पचास हजार का इनाम था. पता चलता है कि इनाम एक दिन पहले ही घोषित किया गया था . शायद उसे उठाकर अवैध हिरासत में लाने के बाद. आप चुप रहते हैं. कहानी समझते हैं. ये भूल जाते हैं कि आप भी वैसी ही जनता है.

जीवन में थोड़ी संवेदनाएं लाएं. जीवन में खबरों को जीवन समझें वो भले ही कितने मनोरंजक तरीके से आपके सामने लाई जा रही है लेकिन वो मनोरंजन नहीं हैं. वो सच है. हकीकत जिसे आप नकार नहीं सकते. अपने परिवेश पर नजर रखें. पड़ोस के फ्लैट में ताला टूटने पर जैसी संवेदनाएं जागती हैं और सुरक्षा के इंतजाम करने को दोड़ पड़ते है वैसे ही जीवन को उससे ज्यादा प्रभावित करने वाली चीज़ें भी हैं. एक फैसला आपको कंगाल बना सकता है.कई लोगों के कारोबार बंद होते हमने देखे हैं. कई नौकरियां छिनती देखी हैं. एक नेता के करप्शन के कारण हजारों लोग ईएमआई भर रहे हैं और उनके घर पता ही नहीं कि मिलेंगे कि नहीं. ये दूर की कौड़ी नहीं है. ये उपन्यास नहीं है जो किताब में ही दफन रहेगा. ये जिंदगी है यारो. ये खबर है.

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