कर्नाटक के नतीजे बताते हैं कि मोदी 2019 में औंधे मुंह गिरेंगे ?

ये विश्लेषण वरिष्ठ पत्रकार प्रभात डबराल का है. उन्होंने आंकड़ों के ज़रिए 2014 से लेकर अब तक कर्नाटक में बीजेपी की दशा में आए बदलाव को दिखाया है. अब तक माना जाता था कि उत्तर भारत के राज्यों में अपना श्रेष्ठतम प्रदर्शन कर चुकी बीजेपी का 1019 में कुछ कम होना तय था. ऐसे में दक्षिण भारत से बीजेपी के लिए कुछ राहत की आस थी लेकिन कर्नाटक चुनाव ने उस सपने को भी धराशायी कर दिया है . पढ़िए श्री डबराल का लेख ..

अगर आपको कर्णाटक के ताज़ा विधानसभा परिणामों का विश्लेषण २०१९ के आमसभा चुनावों के सन्दर्भ में करना है तो आपको अपनी यात्रा २०१४ के तूफानी आमचुनावों से शुरू करनी होगी:
२०१४ के आमचुनावों में कर्णाटक में:
-बीजेपी को ४३% वोट मिले थे और उसे १३२ विधानसभा सीटों पर बढ़त मिली थी.
-कांग्रेस का वोट प्रतिशत था ४०.८ और उसे बढ़त मिली थी ७७ सीटों पर.
-जेडीएस को ११% वोट मिला था उसे बढ़त मिली थी १५ सीटों पर.

(ये ध्यान में रखियेगा कि २०१४ में राजनीतिक परिदृश्य लगभग यही था. तीनों पार्टियां अलग अलग लड़ रही थीं. येदुरप्पा वापस बीजेपी में आ चुके थे. हाँ, एक फर्क था. चंद्रबाबू नायडू २०१४ में बीजेपी के साथ थे, इस बार नहीं थे. कर्णाटक की १०-१२ सीटों पर तेलुगु भाषियों का असर है)

अब २०१४ की तुलना २०१८ के ताजे परिणामों से करते हैं.

-सबसे ज़्यादा नुकसान बीजेपी को हुआ है जिसका वोट गिरकर ३६.५ पर पहुंच गया है और २०१४ में जहाँ १३२ सीटों पर बढ़त थी इस बार सीटें मिली हैं १०४, यानि २८ विधानसभा सीटों का नुकसान.
-चोट कांग्रेस पर भी ज़बरदस्त लगी है. उसका वोट ४०.८ से घटकर ३८ पर आ गया लेकिन जहाँ २०१४ में बढ़त ७७ सीटों पर थी इस बार सीटें मिली ७८, यानि एक सीट का फायदा.
-सबसे मजे में रही जेडीएस जिसका वोट प्रतिशत ११ से बढ़कर १५ हुआ और २०१४ में ११ सीटों पर बढ़त की जगह उसने सीटें हासिल का लीं ३७ -यानी २६ सीटों का फायदा.

इन आकड़ों से अपन को तो लगता है कि कर्णाटक में बीजेपी का ग्राफ गिरा है. लेकिन आप चाहें तो इन आंकड़ों से अपना मनपसंद निष्कर्ष निकल सकते हैं-सान्नू की. आख़िरकार ये आंकड़े ही तो हैं. आपकी खुशी में हमारी ख़ुशी. लेकिन ज़रा सोचिये कि २०१९ में अगर कांग्रेस और जेडीएस मिलकर लड़ गए तो….

वैसे एक फैक्टर चंद्रबाबू नायडू भी हैं. जो वापस एनडीए में आ सकते हैं. उनका इतिहास बताता है कि वो बड़े सीधे हैं, आसानी से और थोड़े में पट जाते हैं. फिर इस बार तो उनका सामना मोदी/शाह जैसे धुरंधरों से है. लेकिन मित्रों, कर्णाटक में बीजेपी को ज़्यादा नुकसान तेलुगु भाषी इलाकों में नहीं हुआ, उनको सबसे बड़ा झटका बंगलुरु जैसे कॉस्मोपॉलिटन क्षेत्रों में लगा है जहाँ बड़ी तादाद पढ़े लिखे, पहली बार वोट देने वाले युवाओं की है -मोहभंग की असली कहानी यही है…और हो सकता है कि इसीसे २०१९ की स्क्रिप्ट बने.

अपने हिसाब से अब तक की तो यही कहानी है, बाक़ी बाबरी मस्जिद वाले राम जानें…