‘चौकीदार’ की नींद ऐसे उड़ा रहा है ‘पप्पू’

आप असहमत हो सकते है लेकिन सच तो सच है. इस चुनाव में जिसे आप पप्पू समझ रहे थे वो लगातार चुनाव का एजेंडा सेट कर रहा है. उसके पास नये मुद्दे हैं. भविष्य के लिए एक तस्वीर है , ठीक वैसी या थोड़ी कम ज्यादा जैसी 2014 में मोदी के पास थी.

अब न्याय नाम से न्यूनतम वेतन गारंटी योजना है तो सारी बहस और विमर्ष उसके आसपास घूम रहा है. हालत ये है कि मोदी को व्यक्तिगत रूप से प्यार करने वाले भी ऐसे रिएक्ट कर रहे हों कि राहुल गांधी का सत्ता में आना तय है और ये स्कीम लागू होने से रोकना बहुत ज़रूरी है.

इससे पहले राफेल पर चौकीदार चोर है वाला नैरेटिव जब आया तो पहले उसे बीजेपी ने झिड़क देना चाहा. फिर कहा कि ये सच मानने को तैयार ही नहीं है. आखिर कागज़ात सामने आते आते हालात ये हो गये कि बीजेपी को मैं भी चौकीदार नारा देना पडा. बड़ी बात ये रही कि इससे चौकीदार शब्द को बल मिला और चौकीदार चोर का नारा साथ साथ चलता रहा. जब भी कोई कहता कि मैं भी चौकीदार हूं तो राहुल गांधी का चौकीदार चोर है भी साथ में दिमाग में आता.

सूट बूट की सरकार में भी यही हुआ. मोदी को अपने पसंदीदा कपड़ों को छोड़ना पड़ा. महंगे सूट से मोदी कुर्ते पजामे तक आ गए. उनके शिरोधार्य भी बदल गए. और साफों की कलगी भी कम होने लगी.

इसके विपरीत बीजेपी के पास वही घिसे पिटे मुद्दे हैं. वो भारत पाकिस्तान के सेंटिमेंट को भुनाती रही जो की सालों से यथावत है और कई मामलों में उसके परंपरागत समर्थकों के अलावा नये लोगों को जोड़ने के लिए कुछ नहीं करता. बल्कि जो बैलेन्स्ड लोग थे वो तो इमरान खान के कदमों के बाद शांत पड़ गए. अभिमन्यु का कैद होना और छूटकर आना पूरे तनाव को डिफ्यूज़ कर गया. पाकिस्तान के प्रति गुस्सा काफी कम पड़ गया.

राम मंदिर के मुद्दे को त्यागकर बीजेपी ने खुद के समर्थकों को नाराज़ किया. बहुत बड़ी संख्या में न सही लेकिन परंपरागत बीजेपी समर्थक इससे निराश हुए. ऐसी ही निराशा बीजेपी को परपरागत संमर्थकों को बुजुर्ग नेताओं की उपेक्षा से हुई.

उम्र एक बड़ा कारण है एक दिन सबको रिटायर होना ही होता है. लेकिन अडवाणी और जोशी जैसे नेताओं का टिकट काट देना और उन्हें अदने से महासचिव से सूचना भिजवा देना समर्थकों को अच्छा नहीं लगा होगा. इतने बड़े नेताओं के महासचिव के जरिए ये आदेश भिजवाया जाए कि वो खुद दिल्ली आकर रिटायरमेंटका एलान कर दें, कितना खराब रहा होगा.

ये बातें भी पर्दे में होतीं तो शायद वोटर दुखी न होता लेकिन सार्वजनिक रूप से मुरली मनोहर जोशी ने इसका एलान वोटरों के नाम पत्र लिखकर किया तो पार्टी के परंपरागत वोटर को धक्का लगना लाजमी है.

इससे पहले अटल विहारी वाजपेयी की उपेक्षा का मुद्दा भी पुराने बीजेपी के लोगों को अखरा था. अटल जी के निधन पर पीएम मोदी ने एक ईवेंट खड़ा कर दिया और इसे फोटो अपॉर्चुनिटी में बदल डाला. लेकिन जब देश भर से अटल जी के नाम पर स्मारकों, सड़कों, मैदानों और इमारतों का नाम रखने की मांग उठी तो मोदी और शाह की जोड़ी ने इसे नज़रअंदाज़ कर दिया. मीड़िया में खबरें तो आईं कि नाम बदलेगा लेकिन कुछ हुआ नहीं.

बीजेपी समर्थकों के बीच लगातार ये भी प्रचार किया जाता रहा है कि मोदी और शाह की बीजेपी वो बीजेपी नहीं है. इसमें पुराने नेताओं की जगह नहीं है. बुजुर्ग नेताओं की बात छोड़ भी दें तो न तो सुषमा स्वराज इस सरकार में सहज हैं न राजनाथ सिंह, कलराज मिश्र को तो घर बैठा ही दिया गया है.कल्याण सिह भी किनारे पर हैं. जो दो चार तेज़ तर्रार नेता थे उन्हें भी बुरे हाल में पहुंचा दिया गया है. गिर्राज सिंह अपनी सीट को लेकर परेशान है. उन्हें कन्हैया कुमार के सामने छोड़ दिया गया है.

रवि शंकर प्रसाद को पटना साहेब सीट पर फंसा दिया गया है. साक्षी महाराज का टिकट कटते कटते बचा. शिवराज सिंह और वसुंधराराजे दिल्ली लाकर निष्क्रिय कर दिए गए हैं. शत्रुघ्न सिन्हा, यशवंत सिन्हा जैसे नेता पहले ही बगावत के साथ अपनी आवाज़ उठाते रहे हैं.

कुल मिलाकर पार्टी में या तो ये दोनों नेता हैं या इनकी हां में हा मिलाने वाले लोग. ऐसी हालत में पीढ़ियों से पार्टी से जुड़ा नेता सफलता से खुश तो है लेकिन पार्टी के स्वरूप के बदल जाने से दुखी है. लेकिन इन सदस्यों का एक हिस्सा ज़रूर हो सकता है पार्टी के खिलाफ वोट दे.

जो भी हो इस चुनाव में पार्टी कोई बड़ा खेल करती नहीं दिख रही. उपलब्धियों के नाम पर चुनाव के समय लगातार नकारात्मक रिपोर्ट्स जनता के सामने आ रही हैं. भले ही वो एडीआर की रिपोर्ट हो या आर्थिक आंकड़े या फिर रोज़गार के आंकड़े सरकार लगातार हमलों में घिरी है.

पीएम मोदी के भाषणों में भी इस बार वो पहले वाला जादू नहीं है, वजह शायद ये हैं कि मोदी के पास नया बताने को कुछ नहीं है अगर वो कोई भी योजना लोगों के सामने रखते हैं तो पूछा जाएगा कि पांच साल में क्यों नहीं रखी. उपलब्धियां ऐसी हैं कि जिनका जिक्र तक आत्मघाती है. चाहे वो नोटबंदी हो, आधार हो या जीएसटी. आखिर मोदी कहें तो क्या कहें.

ऐसे में यही कहा जा सकता है कि चुनाव प्रचार को दिशा कथित पप्पू जी ही दे रहे हैं. भले ही कोई माने या न माने लेकिन ये आंखों से दिखाई दे रहा सच है.

फेसबुक पर आजतक के वरिष्ठ पत्रकार गिरिजेश का पोस्ट