मरते किसानों के खेतों में राजनीति की खेती

मरते किसानों के खेतों में राजनीति की खेती

रिज़वान अहमद सिद्दीकी,
प्रधान संपादक, न्यूज़ वर्ल्ड चैनल

खेती लाभ का धंधा कब बनेगा यह एक बड़ा सवाल है लेकिन खेती सियासी फंदा जरूर बन गया है, जिसे पक्ष – विपक्ष एक दूसरे पर आज़माने की कोशिश में हैं. मध्य प्रदेश इस जोर आजमाइश का केंद्र बन गया है, मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान मंदसौर पहुँचकर ग्राउंड जीरो पर रूबरू हो रहे हैं, गोलीकांड के पीड़ितों से भी मिलने पहुंचे वहीं मंगलवार को मन्दसौर पहुँचने से पहले ही गिरफ़्तार कर लिये गये पूर्व केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया राजधानी भोपाल में 72 घन्टे के सत्याग्रह पर आ डटे हैं.

खेती अनेक किसानो के लिये फाँसी का फंदा बन चुकी है, ऐसे दौर में जब सत्ता और विरोधी दल सभी जोर शोर से किसान को अपना बनाने लगे हैं ऐसे में भी किसान मौत को गले लगा रहा है पिछले 48 घन्टो में भी आत्महत्या का सिलसिला थमा नही है. खेती की सियासी जमीन पर राजनितिक दल एक दूसरे को इस फंदे में जकड़ना चाहते हैं, चुनाव की बेला आने वाली है इसलिये यह धंधा शवाब पर हैं.

इस फंदे के साथ ग्राम फंदा की वृद्ध कमला देवी का अनशन भी खासा चर्चा में है, उन्हे उपवास के दौरान मुख्यमंत्री से मिलने से पुलिस ने साजिशन रोक दिया था. शांति के लिये मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान उपवास का ब्रह्मास्त्र उपयोग कर चुके हैं, राजनीती में तुकबंदी होती है तो सिंधिया उपवास को उपहास बता रहे हैं.

अजब इत्तेफ़ाक है शिवराज सिंह के तक़रीबन 24 घन्टे के उपवास के बाद सिंधिया का 72 घन्टा, पहाड़े की तरह है 24 त्रिक 72 लेकिन राजीनीति किसी एक फार्मूले या सिद्धान्त पर नही चलती है. गुटबाज़ी के लिये कांग्रेस तो चर्चा में रहती है लेकिन बीजीपी भी अब अंतर्कलह से घिरी हुई है. सत्याग्रह से फिलहाल कांग्रेस के दिग्गज नेता कमलनाथ की गैरमौजूदगी चर्चा में है तो कृषि मंत्री गौरीशंकर बिसेन और सांसद भगत का वाकयुद्ध भी सुर्ख़ियों में है.

जिस समय नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह मुख्यमंत्री के उपवास के जवाब में वैसा ही कुछ करने को नौटँकी करार दे रहे थे उसी समय सिंधिया ने अपने दिल्ली कार्यालय से सत्याग्रह का ऐलान कर दिया, जिसमे उस समय प्रदेश कार्यालय शामिल नही था. शिवराज सिंह चौहान और ज्योतिरादित्य सिंधिया के रिश्ते खासे चर्चित रहे हैं. क्रिकेट कमेटी की सियासत में बीजीपी के महासचिव कैलाश विजयवर्गीय के मुक़ाबले शिवराज सिंह का समर्थन उन्हें मिलता रहा है, इसका खुलासा बीजेपी के एक नेता कर भी चुके हैं. यह पहला मौका नही है, जब सिंधिया और शिवराज आमने – सामने है 2013 के विधान सभा चुनाव में दोनों मैदान में थे, हालाँकि ज्योतिरादित्य सिंधिया को जिम्मेदारी काफ़ी देर से दी गई थी.

प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान और सिंधिया के बीच रस्साकशी की शुरुआत अटेर विधानसभा उपचुनाव के समय हुई, जब शिवराज सिंह चौहान ने सिंधिया परिवार के अतीत को कुरेद दिया था जिसके बाद जमकर बयानबाज़ी हुई थीं. राजनीती के जानकार मानते है शिवराज सिंह ने आगामी चुनाव के लिये जानबूझकर बड़ी चालाकी से अपना प्रतिद्वंदी चुना है, वो इसे राजा और रंक ( आम आदमी ) की जंग बनाना चाहते हैं. यह राजनीत में जोखिम भरा कदम है लेकिन शिवराज सिंह समझते हैं, 15 साल की सरकार की एंटी इन्कम्बेंसी होती है जिसे ऐसे ही जीत में बदला जा सकता है.

सिंधिया एक आकर्षक चेहरा हैं लेकिन ग्वालियर चम्बल संभाग के बाहर उनका सीधा सम्पर्क कम ही है. सत्ता से बाहर कांग्रेस आर्थिक संकट से जूझ रही है जिसकी कुंजी कमनाथ के पास मानी जाती है, प्रदेश में उन्हें अहम जिम्मेदारी देने की चर्चा जोरों पर रही है लेकिन शिवराज सिंह या प्रभात झा के हमलों के कारण सिंधिया ज्यादा चर्चा में हैं ऊपर से यह सत्याग्रह भी मुक़ाबला इन्ही के बीच इंगित करता है.

सिंधिया से मुक़ाबला दिखने के कारण आये दिन प्रदेश अध्यक्ष अरुण यादव के बदले जाने की चर्चायें भी सरगर्म रहती हैं जिससे कार्यकर्ता असमंजस में है, इसीलिये इसे शिवराज की रणनीति के तौर पर भी देखा जाता है. इतना तो तय है राम, गाय, ट्रिपल तलाक़ से आगे निकलकर प्रदेश में अन्नदाता प्रमुख मुद्दा हो गया है. स्वयं को किसान पुत्र कहने वाले मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, सरकार के खिलाफ़ पनपे आक्रोश को समाप्त करने में दिनरात एक कर रहे हैं तो कांग्रेस भी बैठे बिठाये मिले इस मुद्दे की आग को सुलगाये रखने की हर सम्भव कोशिश में है. सत्याग्रह से सरकार की घेराबन्दी के साथ ही सिंधिया ने फिलहाल स्वयं को मुक़ाबले में आगे कर लिया है वो टेंट में भोजन करा रहे हैं सो रहे हैं, इसी बहाने वो अपनी महाराजा की छवि से बाहर निकलने की जद्दोजहद में भी लगे हैं.