केजरीवाल की बेबसी की ये कहानी पढ़कर प्लीज़ ठहाके मत लगाइएगा

केजरीवाल की बेबसी की ये कहानी पढ़कर प्लीज़ ठहाके मत लगाइएगा

नई दिल्ली : अरविंद केजरीवाल की जगह कोई और होता तो या तो झोला उठाकर चल देता या फिर से धरने पर बैठ जाता. दिल्ली में सरकार चलाना असंभव से भी ज्यादा मुश्किल होने लगा है. आजतक के चैनल दिल्ली आजतक ने जो खबर दिखाई है उससे साफ पता चलता है कि केजरीवाल के लिए काम करना कितना मुश्किल होगा. अगर आप होते तो आप भी काम न कर पाते.
पूरा किस्सा अरविंद केजरीवाल के 3 साल पूरे होने से जुड़ा है. दर असल इस मौके पर केजरीवाल का एक संदेश चैनल पर चलना है. सुप्रीम कोर्ट का आदेश है कि जो भी कुछ चलेगा अफसर पास करेंगे. लेकिन अफसरों ने ऐसा अड़ंगा लगाया कि आपको पहले हंसी आएगी फिर आपको खुद पर ही गुस्सा आ जाएगा कि क्यों हंस रहे हैं.

दरअसल इस संदेश में एक लाइन है. इस लाइन में केजरीवाल कहते हैं – वो कहते हैं न जब आप सच्चाई और ईमानदारी के रास्ते पर चलते है तो ब्रम्हांड की सारी दृश्य और अदृश्य शक्तियां आपकी मदद करती है
इस लाइन पर जाकर मामला अटक गया. दिल्ली सरकार के अफसर इस लाइन को सर्टिफाई करने को तैयार नहीं है. एक एक करके सभी विभागों के लोग कह चुके हैं कि ये लाइन उनके विभाग से संबंधित नहीं है इसलिए वो इस लाइन को क्लियर नहीं कर सकते.

खुद मुख्य सचिव समझ नहीं पा रहे कि किससे ये लाइन मंजूर करवाएं. सभी सुप्रीम कोर्ट के किसी पुराने आदेश को लेकर बैठ गए हैं. सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश का हवाला देकर अब मुख्यमंत्री के इस संदेश को फसा दिया गया है.
12 फरवरी को ये एक लाइन पास कराने के लिए बाकायदा बैठक हुई. बैठक में मुख्य सचिव समेत सभी बड़े आईएएस अधिकारी मुख्यमंत्री आवास पर मौजूद थे, लेकिन कोई भी इस लाइन को क्लियर करने को तैयार नही हुआ. उनका ये जवाब सुनकर मुख्यमंत्री केजरीवाल गुस्से से फट पड़े. उन्होंने बैठक में अपना सर पकड़ लिया. केजरीवाल ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने ये नियम तथ्यों की जांच करने के लिए बनाए थे. लेकिन अफसर सेंसरशिप का काम करने लगे. अगर एक राज्य का मुख्यमंत्री अपनी मर्ज़ी से एक लाइन नहीं बोल सकता तो सरकार कैसे चलाएगा.

मुख्यमंत्री ने मुख्य सचिव से कहा कि सुप्रीम कोर्ट इन आईएएस अधिकारियों से दिमाग के इस्तेमाल की अपेक्षा करता है और ये तो दिमाग से काम करने के बजाय बस काम अटका रहे है.
मुख्यमंत्री ने कहा मुख्य सचिव साहब मैं अफसरशाही से बहुत दुखी हो चुका हूं, ऐसा कोई भी दिल्ली सरकार का काम नही जिसे ये अटकाने की कोशिश न करते हो. ये कहानी आप चाहें तो मनोरंजन के लिए पढ़ें या फिर केजरीवाल की मजबूरी समझने के लिए लेकिन ये शर्मनाक सच है कि एक निर्वाचित मुख्यमंत्री को अफसरों ने इस कदर जकड़ा हुआ है.