बाबरी मामले में संघ परिवार ने झूठ बोला ? तब की हकीकत बयान करता प्रभाष जोशी को लेख

बाबरी मामले में संघ परिवार ने झूठ बोला ? तब की हकीकत बयान करता प्रभाष जोशी को लेख

बीजेपी ने किस तरह साजिश करके बाबरी मस्जिद को ढहाया था उसे इस लेख से आसानी से समझा जा सकता है. लेख जनसत्ता के संपादक और देश के इतिहास के सबसे जाने माने पत्रकारों में से एक प्रभाष जोशी का है. ये लेख उन्होंने एक वीडियो फिल्म देखकर लिखा था. वैसे तो उन्होंने कई लेख लिखे थे लेकिन ये लेख अहम है. ‘ढहाने का झूठ और सच’ नाम से उनके लेख का शुरुआती हिस्सा पढ़िए तो पता चलेगा कि अयोध्या में छह दिसंबर 1992 को हुआ क्या था.

” कहां देखी, कैसे देखी और किसने दिखाई,यह तो आपको नहीं बताऊंगा. बताऊंगा तो किसी के साथ विश्वासघात होगा. लेकिन छह दिसंबर को अयोध्या में विवादित ढांचे के सामने परदे से ढंकी किसी जालीदार खिड़की से सुबह सवा छह बजे से रात ग्यारह बजे तक खींची गई उस असंपादित वीडियो फिल्म को देखने के बाद मुझे कोई शक नहीं रह गया है. यह एक सफेद झूठ है कि ढांचे का ढहना हिन्दू भावनाओं का विस्फोट था. उसमें तात्कालिकता कहीं नहीं थी. ढांचे को तोड़ने में कहीं कोई हड़बड़ी नहीं थी. सिर पर फेंटा बांधे गुंबदों पर चढ़े युवक भले ही कारसेवक रहे होंगे लेकिन ढांचे को तोड़ने वाले जानकार मजदूर होंगे क्योंकि किसी भवन को कैसे तोड़ा जाता है, इसकी उन्हें अच्छी जानकारी थी. तोड़ने वालों को जैसे विश्वास था कि काम पूरा होने तक उन्हें कोई रोकने वाला नहीं है. रात को तो उन्होंने बाकायदा बिजली की झकाझक रोशनी में काम किया.

जश्न मनाती उमा भारती

सुबह कोई ग्यारह चालीस पर कारसेवकों का हरावल दस्ता बिना किसी रोक-टोक के ढांचे के अंदर पहुंच गया. तोड़-फोड़ का काम शाम कोई साढ़े पांच बजे तक चलता रहा. इस दौरान न तो कोई ढांचे पर अचानक हमला हुआ और न भगदड़ मची. लाल कृष्ण आडवाणी का इनता कहना तो सही है कि तोड़-फोड़ करने वाले कोई पांछ -छह सौ लोग रहे होंगे और उस परिसर में कुछ हजार. लेकिन जब कारसेवक गुंबदों पर चढ़ गए और भगवा झंडा लहराने लगे तो वे कुछ सौ से ज्यादा नहीं थे. वे भी कोई पुलिस का घेरा तोड़ कर प्रतिरोध करते हुए नहीं गए थे. उन्हें संघ परिवार के किसी भी नेता ने रोकने की कोशिश नहीं की.

लाउडस्पीकर पर भजन कीर्तन, ऋतंभरा का भाषण, सूचनाएं और निर्देश तो जरुर सुनाई दिए लेकिन आडवाणी, जोशी या किसी सिंघल या कटियार या साधु -महात्मा को रोकने की अपील नहीं सुनाई दी. सुबह से ही पुलिस वाले लाठी लिए भीड़ में घूमते -फिरते दिखे और फिर जब गुंबद को तोड़ा जा रहा था तो वे सब कतार बनाकर दूर एक तरफ खड़े हो गए थे. ठंढी रात में ओवरकोट पहने और लाठी फटकारते फिर मलबे के आसपास मंडरा रहे थे. कहते हैं उन्हें बल प्रयोग करने का आदेश नहीं था. लेकिन उनने कभी आंसू गैस छोड़ने या तोड़-फोड़ कर रहे लोगों को समझा कर रोकने की भी कोशिश नहीं की. पुलिस वाले जैसे किसी मैयत में डियूटी करने आए थे. वे मूक दर्शक ही नहीं, जो कुछ हो रहा था उसे मजे से देख रहे थे.

न नेताओं ने, न पुलिस वालों ने, किसी ने भी उस ढांचे को टूटने से बचाने की कोशिश नहीं की, जिसके लिए भारत सरकार, भाजपा और यूपी सरकार, भाजपा और संघ परिवार के नेताओं ने वचन दिया था. सुप्रीम कोर्ट, हाईकोर्ट और संसद के सामने हलफनामे और बया दिए थे कि ढांचे को हाथ नहीं लगाया जाएगा. लेकिन जब वो तोड़ा जा रहा था तो किसी ने अपना वचन निभाने की कोशिश नहीं की. शुरु में पुलिस के साथ घेरा बनाकर खड़े स्वंयसेवकों ने लोगों को रोकने की कोशिश जरुर की. फिल्म में हाथापाई के एक दो दृ्श्य दिखाई देते हैं लेकिन इसके बाद तो तोड़ने वाले भी खाकी पैंट और काली टोपी लगाए हुए थे. जब तोड़ -फोड़ हो रही थी तब एक भी नेता वहां किसी को रोकने नहीं गया. आडवाणी ने सच कहा था कि कार सेवा गैंती -फावड़े से होगी.

उसके शुरु होने के पहले अशोक सिंघल के आने और मौके का मुआयना करने के काफी देर तक चलने वाले दृश्य हैं. फिर आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी के आने और घूम -फिर कर व्यवस्था देखने के दृश्य हैं. कहा जाता है कि आडवाणी को गलत -सलत होने की भनक मिल गई थी और वे बड़े तनाव में थे.लेकिन जुलाई में हुई कारसेवा से बने चबूतरे पर आते और परिसर में घूमने फिरने में उनकी चाल हिचक की नहीं लगती. मुरली मनोहर जोशी भी प्रसन्न मुद्रा में घूमते दिखाई देते हैं. इन दोनों के पीछे साधवी कही जाने वाली ऋतंभरा भी दिखाई देती है. एक बार तो वो बहुत प्रसन्न दिखाई देती हैं. अशोक सिंघल का मौका मुआयना किसी जनरल के जैसा है. कोईए हाथ जोड़ता है तो जवाब में हाथ जोड़ लेते हैं लेकिन बिल्कुल कामकाजी ढंग से. आडवाणी और जोशी जैसा नेताई निरीक्षण उनकी नहीं है.

ढांचा टूटने के दृश्य देखते हुए सहज ही लगता है कि इस समय ये सारे नेता कहां हैं. क्यों किसी की सूरत या आवाज सुनाई नहीं देती है. कैमरा उन्हें दिखाता क्योंकि उसकी आंख तो सीधे ढांचे और उसकी जगह पर लगी है. लेकिन जैसा कि आप जानते हैं नेता लोग और साधु -महात्मा राम कथा कुंज में हो रही सभा के मंच पर विराजमान थे. उस सभा के कुछ भाषण और भजन -कीर्तन कैमरे के कान ने पकड़े हैं. बल्कि गैंती फावड़े और कुल्हाड़ी सी आवाजें निरंतर सुनाई देती है. लेकिन ऐसी कोई अपनी नहीं सुनाई देती जो कार सेवकों को अपकर्म करने से रोकने के लिए की गई है. संघ परिवार के जिम्मेदार नेता कहते हैं कि जो हुआ उससे वे खुद हतप्रभ और दुखी थे. यह भी कहा गया है कि भाजपा, विहिप और संघ के नताओं को तो मालूम ही नहीं था कि क्या हो रहा है. कुछ लोग जिनमें अशोक सिंघल, विनय कटियार, मुरली मनोहर जोशी आदि शामिल बताए जाते हैं, उन्हीं को गुप्त योजना या साजिश का पता था या वही उसके कर्ताधर्ता थे. ढांचा गिराने की ट्रेनिंग और रिहर्सल बकायदा अयोध्या में चल रही थी और उसके फोटो भी अखबारों में छपे हैं.