संविधान से सैक्युलर शब्द हटाना चाहती है मोदी सरकार ? मंत्री का अभद्र बयान

संविधान से सैक्युलर शब्द हटाना चाहती है मोदी सरकार ? मंत्री का अभद्र बयान

नई दिल्ली : केंद्रीय राज्य मंत्री अनंतकुमार हेगड़े ने कहा –  “सेक्युलरिस्ट लोगों का नया रिवाज़ आ गया है. अगर कोई कहे कि वो मुस्लिम है, ईसाई है, लिंगायत है, हिंदू है तो मैं खुश होऊंगा. क्योंकि उसे पता है कि वो कहां से आया है. लेकिन जो खुद को सेक्युलर कहते हैं, मैं नहीं जानता कि उन्हें क्या कहूं. ये वो लोग हैं जिनके मां-बाप का पता नहीं होता या अपने खून का पता नहीं होता.”

इस घटिया बयान के साथ ही उन्होंने कहा कि संविधान से सैक्युलर शब्द भी निकाला जा सकता है. उन्होंने कहा-  “कुछ लोग कहते हैं कि ‘सेक्युलर’ शब्द है तो आपको मानना पड़ेगा. क्योंकि यह संविधान में है, हम इसका सम्मान करेंगे लेकिन यह आने वाले समय में बदलेगा. संविधान में पहले भी कई बदलाव हुए हैं. अब हम हैं और हम संविधान बदलने आए हैं.” कर्नाटक के कोप्पल ज़िले में रविवार को ब्राह्मण युवा परिषद के कार्यक्रम में बोलते हुए ‘सेक्युलरिज़्म’ का विचार उनके निशाने पर था.

हेगड़े ने कहा कि संविधान में अब तक सौ से ज़्यादा संशोधन किए जा चुके हैं, लेकिन क्या संसद को यह अधिकार है कि वह संविधान की मूल प्रस्तावना को बदल सके?

शायद हेगड़े को नहीं पता कि संविधान संशोधन का फैसला बच्चों का खेल नहीं है. संसद की सभी सीटें लाकर भी संविधान में ऐसा संशोधन नहीं किया जा सकता जो उसकी मूल भावना के खिलाफ हो. 1973 में सुप्रीम कोर्ट के सामने एक मामला आया था . मुख्य न्यायाधीश एस एम सिकरी की अध्यक्षता वाली 13 जजों की बेंच ने इस मामले में ऐतिहासिक फैसला दिया था. यह केस था- ‘केशवनंदा भारती बनाम स्टेट ऑफ़ केरला’, जिसकी सुनवाई 68 दिनों तक चली थी.

संविधान के आर्टिकल 368 के हिसाब से संसद संविधान में संशोधन कर सकती है. लेकिन इसकी सीमा है. लेकिन सात जजों के बहुमत से फैसला दिया गया कि संसद की शक्ति संविधान संशोधन करने की तो है लेकिन संविधान की प्रस्तावना के मूल ढांचे को नहीं बदला जा सकता है. कोई भी संशोधन प्रस्तावना की भावना के खिलाफ़ नहीं हो सकता है.

यह केस इसलिए भी ऐतिहासिक रहा क्योंकि इसने संविधान को सर्वोपरि माना. न्यायिक समीक्षा, पंथनिरपेक्षता, स्वतंत्र चुनाव व्यवस्था और लोकतंत्र को संविधान का मूल ढांचा कहा और साफ़ किया कि संसद की शक्तियां संविधान के मूल ढांचे को बिगाड़ नहीं सकतीं. संविधान की प्रस्तावना इसकी आत्मा है और पूरा संविधान इसी पर आधारित है.