मेदी के एक गलत कदम से खड़ा हुआ पर्यावरण का खतरा

मेदी के एक गलत कदम से खड़ा हुआ पर्यावरण का खतरा

बिलासपुर :  सरकार के अदूरदर्शी फैसले कैसे प्रभावित करते है इसका एक उदाहरण है गैस से सब्सिडी हटाने का कदम, छत्तीसगढ़ के आदिवासी बहुल विलासपुर में प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना की हवा निकल गई है. बीपीएल परिवार के 10 हजार रसोई गैस कनेक्शन धारकों ने तो गैस सिलेंडर दोबारा रिफिल ही नहीं कराया है. डेढ़ महीने बाद इन्होंने रसोई गैस से तौबा कर वापस मिट्टी के चूल्हे और लकड़ी से भोजन बनाना शुरू कर दिया है. एक गलत कदम से सरकार ने सब्सिडी के पैसे तो बचा लिए. रिलायंस जैसी कंपनियों को फायदा भी हुआ. लेकिन पर्यावरण के लिए खतरा बढ़ गया और जाहिर बात है ग्लोबल वार्मिंग में योगदान देने के कारण कार्बन क्रेडिट भी घटेगा.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की महत्वाकांक्षी पीएम उज्ज्वला योजना जिले के आदिवासी व वनांचल क्षेत्र में फेल साबित हो रही है. गरीबों को लकड़ी व कंडे से निकलने वाले धुएं से निजात दिलाने के लिए रसोई गैस कनेक्शन के साथ सिलेंडर व चूल्हा जारी किया जा रहा है. लेकिन एक बार सिलेंडर खत्म होते ही काफी महंगा सिलेंडर खरीदना पड़ता है.

वर्ष 2016-17 में प्रदेश में योजना की शुरुआत की गई है. प्रारंभिक चरण में जिले में वनांचलों के साथ ही आदिवासी बहुल इलाके में रहने वाले गरीबों को रसोई गैस कनेक्शन का लाभ दिलाने की योजना बनाई गई थी. इसी के तहत मरवाही व कोटा के वनांचलों में रहने वाले आदिवासी परिवारों को गैस कनेक्शन का वितरण किया था.

कनेक्शन देने के समय पहला सिलेंडर केंद्र सरकार द्वारा फ्री में दिया गया था. जब तक गैस से भरा सिलेंडर चला तभी तक आदिवासी महिलाओं ने इसका उपयोग किया. जैसे ही सिलेडर से गैस खत्म हुई तो आदिवासी महिलाओं ने वापस मिट्टी के चूल्हे से खाना बनाना शुरू कर दिया है.

इस संबंध में जब नईदुनिया ने पड़ताल की तो चौंकाने वाली जानकारी सामने आई है. फांके की जिंदगी बसर करने वाले आदिवासियों के पास इतना पैसा नहीं है कि हर डेढ़ महीने में सिलेंडर के लिए साढ़े सात सौ से आठ सौ स्र्पए खर्च कर सकें. इनका कहना है कि दो वक्त भोजन की व्यवस्था करने के लिए स्र्पए नहीं है ऐसे में इतनी बड़ी राशि खर्च कर कहां से सिलेंडर खरीदेंगे .

क्या कहते हैं कनेक्शनधारी

मरवाही तहसील के ग्राम उसाड़ की अघनिया बाई ने बताया कि एक साल पहले रसोई गैस कनेक्शन दिया गया था. एक महीने 18 दिन गैस चूल्हा से खाना पकाया है. गैस खत्म होने के बाद सिलेंडर रिफिल कराने के लिए पैसे नहीं है चूल्हा और सिलेंडर रखा हुआ है. लकड़ी इकठ्ठा कर मिट्टी के चूल्हे से खाना बना रहे हैं .

ग्राम चूकतीपानी की उमेशिया बाई का कहना है कि एक साल पहले गैस कनेक्शन मिला था. तब हमें यह जानकारी नहीं थी कि सिलेंडर को दोबारा रिफिल कराना पड़ेगा. दो वक्त के भोजन के लिए हमें मशक्कत करनी पड़ रही है. भोजन बनाने के लिए सिलेंडर खरीदना उचित नहीं लगता . लिहाजा चूल्हे और लकड़ी से हम लोग भोजन बना रहे हैं . यही हमारे लिए सुविधाजनक है.

इनका कहना है

पीएम उज्ज्वला योजना के हितग्राही बड़ी संख्या में सिलेंडर रिफिल नहीं करा रहे हैं . इसकी जानकारी मिली है. सिलेंडर भरानेे में व्यवहारिक दिक्कतों का हवाला दिया जा रहा है.

जीएस पटेल-फूड कंट्रोलर

केंद्र सरकार की योजना के तहत हम लोगों को उपलब् कराई गई वर्ष 2011 के सर्वे सूची के आधार पर हितग्राहियों को गैस कनेक्शन जारी किया जा रहा है. बीते वर्ष 86 हजार लोगों को कनेक्शन दिया गया था. 20 हजार ऐसे कनेक्शनधारी हैं जिन्होंने दोबारा सिलेंडर नहीं भराया है. (ctsy:naidunia)