नाथूराम गोडसे का मंदिर खत्म, प्रशासन ने हटा दी मूर्ति, लेकिन खबर सिर्फ इतनी नहीं है

नाथूराम गोडसे का मंदिर खत्म, प्रशासन ने हटा दी मूर्ति, लेकिन खबर सिर्फ इतनी नहीं है

ग्वालियर : ग्वालियर के दौलत गंज स्थित हिंदू महासभा भवन में स्थापित की गई नाथूराम गोडसे की मूर्ति हटा दी गई है. शिपराज सरकार की पुलिस ने आज जाकर इस मूर्ति को हटा दिया.  ग्वालियर शहर में नाथूराम गोडसे को तब भी समर्थन मिला था जब उसे वहां पिस्तौल खरीदने और उसकी प्रेक्टिस करने का मौका मिला था. तब से अबतक गोडसे के चाहने वाले वहां है. आरएसएस के प्रमुख गढ़ों में से एक ये शहर है लेकिन पहली वाल ऐसा हुआ है कि इस शहर ने गांधी का साथ दिया है.

आज ही के दिन (15 नवंबर 1949) गोडसे को अंबाला जेल में फांसी दी गई थी। जिस पिस्टल से महात्मा गांधी की हत्या की थी, वो सिंधिया रियासत की सेना के एक अफसर की थी। बताया जाता है कि गोडसे ने प्रेक्टिस भी ग्वालियर के महल परिसर में एक पेड़ पर की. ग्वालियर के तब के महाराजा और ज्योतिरादित्य सिंधिया के दादा जीवाजी राव सिंधिया हिंदू महासभा में हुआ करते थे. उनकी पत्नी विजया राजे सिंधिया कांग्रेस की सदस्य थीं. बाद में विजयाराजे सिंधिया कांग्रेस जनसंघ में आ गईं और उनके बेटे माधवराव ने कांग्रेस का साथ पकड़ लिया.

ग्वालियर में हिंदू महासभा से जुड़े डॉ.दत्तात्रेय परचुरे से गोडसे की मुलाकात हुई और उन्होंने एक पिस्टल का बंदोबस्त कराया। ग्वालियर से पिस्टल खरीदने की वजह यह थी कि सिंधिया रियासत में हथियार के लिए लाइसेंस की जरूरत नहीं होती थी।

परचुरे के परिचित गंगाधर दंडवते ने जगदीश गोयल की पिस्टल का सौदा नाथूराम से 500 रुपए में कराया था। पिस्टल खरीदने के बाद 10 दिन ग्वालियर में रह कर गोडसे और सहयोगियों ने हत्या की तैयारी की थी।

एक कोशिश नाकाम हुई तब गोडसे आया ग्वालियर

महात्मा गांधी की हत्या की साजिश के तहत 20 जनवरी 1948 में की गई कोशिश में नाकाम रहने के बाद नाथूराम गोडसे भाग कर ग्वालियर आ गया था। इस बार उसने अपने साथियों की जगह खुद ही बापू को मारने का इरादा कर लिया था। इसके लिए उसने शहर में हिंदू संगठन चला रहे डॉ.दत्तात्रेय शास्त्री परचुरे के सहयोग से अच्छी पिस्टल की तलाश शुरू की।

ग्वालियर से पिस्टल खरीदने की वजह यह थी कि सिंधिया रियासत में हथियार के लिए लाइसेंस की जरूरत नहीं होती थी। परचुरे के परिचित गंगाधर दंडवते ने जगदीश गोयल की पिस्टल का सौदा नाथूराम से 500 रुपए में कराया था।

इसी पिस्टल से नाथूराम ने 30 जनवरी 1948 को गांधी जी को तीन गोलियां मारी थीं, इसके बाद उनकी मृत्यु हो गई थी।

सिंधिया सेना के अफसर लाए थे इटालियन पिस्टल

1942 में सैकेंड वर्ल्ड वार के दौरान ग्वालियर की एक सैनिक टुकड़ी के कमांडर ले.ज.वीबी जोशी की कमान में अबीसीनिया में मोर्चे पर तैनात की गई थी। मुसोलिनी की सेना के एक दस्ते ने इस टुकड़ी के सामने हथियारों समेत समर्पण कर दिया था।

इन्हीं हथियारों में इटालियन दस्ते के अफसर की 1934 में बनी 9mm बरेटा पिस्टल भी थी। इसे खुद ले.ज.जोशी ने अपने पास रख लिया था। बाद में इसे जगदीश गोयल ने ले.ज.जोशी के वारिसों से खरीद लिया था।

ऐसे हुई महात्मा गांधी की हत्या

बरेटा पिस्टल और गोलियां खरीदकर नाथूराम गोडसे ने 10 दिन तक ग्वालियर में ही स्वर्ण रेखा नदी की तलहटी में इस पिस्टल को चलाने और निशानेबाजी की प्रैक्टिस की और साथी नारायण आप्टे के साथ दादर-अमृतसर पठानकोट एक्प्रेस में बैठ कर दिल्ली रवाना हो गया था। उसके साथ साजिश में ग्वालियर के डॉ. दत्तात्रेय परचुरे, गंगाधर दंडवते, गंगाधर जाधव और सूर्यदेव शर्मा भी शामिल थे।

30 जनवरी 1948 की शाम 5 बजे बापू प्रार्थना सभा के लिए निकले थे। तनु और आभा उनके साथ थीं। उस दिन प्रार्थना में ज्यादा भीड़ थी। फौजी कपड़ों में नाथूराम गोडसे अपने साथियों करकरे और आप्टे के साथ भीड़ में घुलमिल गया। बापू आभा और तनु के कंधों पर हाथ रखे हुए थे। गोडसे ने तनु और आभा को बापू के पैर छूने के बहाने एक तरफ किया, बापू के पैर छूते-छूते गोडसे ने पिस्टल निकाल ली और दनादन बापू पर तीन गोलियां दाग दीं।

हे राम….कहते हुए बापू नीचे गिर गए। तानाशाह मुसोलिनी की सेना की पिस्टल ने महात्मा गांधी की जान ले ली। प्रार्थना सभा में भगदड़ मच गई। गोडसे ने नारे लगाए और खुद ही चिल्ला कर पुलिस को बुलाया। वहां मौजूद लोग तो क्या खुद पुलिस ने भी नाथूराम गोडसे को तब गिरफ्तार किया, जब उसने खुद ही पिस्टल नीचे गिरा दी।