कश्मीर पर मोदी ने मानी अपनी सबसे बड़ी भूल, ये होगी नयी रणनीति

कश्मीर पर मोदी ने मानी अपनी सबसे बड़ी भूल, ये होगी नयी रणनीति




नई दिल्ली:  कश्मीर में अलगाववाद से निपटने के अपने गोली और लाठी के सारे प्रयोग फेल होने के बाद अब मोदी सरकार ने फिर से बोली का रास्ता अपनाया है. इसे एक तरह से सरकार का यू टर्न भी कहा जा सकता है.साढ़े तीन साल तक सैनिक समाधान को प्राथमिकता देने वाली मोदी सरकार अब नये सिरे से रणनीति पर काम कर रही है. मोदी सरकार ने ऐलान किया है कि अब बातचीत की मेज पर सभी पक्षों को लाया जाएगा. पूर्व आईबी चीफ दिनेश्वर शर्मा को सरकार ने सभी पक्षों से बातचीत करने की जिम्मेदारी सौंपी है.

आपको याद होगा कि 18 अप्रैल 2003 को कश्मीर की ग्रीष्मकालीन राजधानी श्रीनगर में बतौर प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने एक जनसभा को संबोधित करते हुए कहा था कि ‘अभी तक जो खेल होता रहा है मौत का और खून का, वो बंद होना चाहिए. लड़ाई से समस्या हल नहीं होती. आपके जो मसले हैं, वे बातचीत से हल हों. बंदूक से मसले हल नहीं होते. बंदूक से आदमी को मारा जा सकता है उसकी भूख नहीं मिटती’.

अब तक कश्मीर को लेकर मोदी सरकार पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के फॉर्मूले को अपनाना चाहती है. रियासत की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती भी जब तब कश्मीर समस्या के समाधान के लिए अटल बिहारी वाजपेयी के बताए मार्ग पर चलने की बात करती रही हैं.

मनमोहन सरकार क नीतियों पर वापसी

जानकारों का कहना है कि मोदी सरकार का नया रुख मनमोहन सिंह की सरकार से भी मिलता है. मनमोहन सरकार ने कश्मीर में तीन गोलमेज सम्मेलन किए, ताकि इसमें कश्मीर से जुड़े सभी दल मिल बैठकर कोई कारगर तरीका निकाल सकें. हालांकि अलगाववादियों ने गोलमेज सम्मेलनों का बहिष्कार किया. मनमोहन सरकार में बाकायदा उन्हें निमंत्रण दिया जाता था कि वे सरकार के साथ बातचीत के लिए आएं. अलगाववादी नेताओं के इस सम्मेलन से दूरी बनाए रखने के कारण पूरी कवायद बेकार साबित हुई.

कश्मीर में शांति बहाली के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के नेतृत्व में फरवरी 2006 में पहली बार गोलमेज सम्मेलन हुआ. इसमें विभिन्न दलों से लगभग 45 प्रतिनिधि शामिल हुए थे. इस सम्मेलन में कश्मीर में शांति कायम करने पर रायशुमारी की गई. इसके बाद 24-25 मई 2006 में दूसरा और फिर 24 अप्रैल 2007 में तीसरी बार गोलमेज सम्मेलन हुआ.

मनमोहन सरकार के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुरू से ही अलगाववादियों के प्रति सख्त रवैया अपनाया हुआ था. 25 अगस्त 2014 को इस्लामाबाद में विदेश सचिव स्तर की वार्ता से ठीक पहले अलगाववादी नेताओं के पाक उच्चायुक्त अब्दुल बासित से मिलने के चलते मोदी सरकार ने वार्ता को ही रद्द कर दिया था. उसके बाद से अलगाववादी नेताओं पर शिकंजा कसना शुरू कर दिया गया. टेरर फंडिंग के आरोप में बीते कुछ महीने से कई बड़े अलगाववादी नेताओं को जेल में डाला जा चुका है.

एनआईए सैयद अली शाह गिलानी और मीरवाइज उमर फारुक पर भी शिकंजा कस रही है. लेकिन अब मोदी सरकार ने कश्मीर में शांति के लिए सभी पक्षों से बातचीत का इरादा जताकर बता दिया है कि कश्मीर में अमन-बहाली के लिए वह आक्रामक रवैये से साथ-साथ नरम रुख अपनाने को भी तैयार है. यानी जिनपर मुकदमे लादे अब उनसे ही बातचीत करेगी.