वसुंधरा सरकार का काला विधेयक वापस, मीडिया और कोर्ट के अधिकार छीनने की थी कोशिश

वसुंधरा सरकार का काला विधेयक वापस, मीडिया और कोर्ट के अधिकार छीनने की थी कोशिश




जयपुर: वसुंधरा सरकार का काला कानून फिलहाल वापस हो गया है. सरकारी कर्मचारियों को FIR से बचाने वाले कानून का हर तरफ से विरोध हो रहा था, आज भी विधानसभा में खूब हंगामा हुआ. आखिरकार वसुंधरा सरकार को झुकना पड़ा. राजस्थान सरकार ने बिल को सेलेक्ट कमेटी में भेज दिया है. इसका मतलब ये हुआ कि जो अध्यादेश सरकार लेकर आई थी वो फिलहाल खत्म हो गया है. सोमवार को विधानसभा के अंदर और बाहर भारी विरोध के बावजूद राजस्थान सरकार ने इस बिल को विधानसभा में पेश किया था.
राजस्थान में बेईमान बचाओ करप्शन बढ़ाओ का ये कानून लेकर आई थी नॉकिंग न्यूज़ ने इसे. जनता को मिले बहुमत का गलत फायदा उठाने वाला बताया था. इस विधेयक के तहत कोई भी रिश्वतखोर या करप्ट अफसर अगर घोटाले करता है तो मीडिया उसका भंडाफोड़ नहीं कर सकती थी. इतना ही नहीं. अदालतें भी उसके खिलाफ एफआईआर करने का आदेश नहीं दे सकतीं थी.
इतना ही नहीं घोटाला खुलने पर अगर आप कोई खबर छापना चाहते हैं तो उसके लिए सरकार से परमिशन लेनी होगी तभी आप उस आदमी का नाम छाप सकते हैं. अगर कोई बोफोर्स जैसा खुलासा या फिर जय शाह जैसे गड़बड़ी अखबार में छापता है तो उसे पुलिस पकड़ ले जाएगी और दो साल तक जेल की सजा मिलेगी.
महारानी वसुंधरा राजे सिंधिया की सरकार ने इस कानून के दायरे से पूर्व व वर्तमान जजों, अफसरों, सरकारी कर्मचारियों और बाबुओं को संरक्षण दिया है. सरकार का नया कानून कहता है कि ऐसे लोगों के खिलाफ पुलिस या अदालत में शिकायत भी नहीं की जा सकेगी. ऐसे मामलों में एफआईआर दर्ज कराने के लिए सरकार की मंजूरी अनिवार्य होगी. अगर सरकार एफआईआर की मंजूरी नहीं देती को आपको 6 महीने इंतज़ार करना होगा उसके बाद आप कोर्ट जा सकेंगे. छह महीने में सरकार के पास लीपापोती का पूरा मौका होगा. वसुंधरा राजे सरकार ने यह नया बिल पारित किया है.
इस नए बिल के मुताबिक ड्यूटी के दौरान किसी जज या किसी भी सरकारी कर्मचारी की कार्रवाई के खिलाफ कोर्ट के जरिए भी एफआईआर दर्ज नहीं कर सकते हैं. इसके लिए सरकारी की अनुमति अनिवार्य होगी. हालांकि अगर सरकार इजाजत नहीं देती है तो 180 दिनों के बाद कोर्ट के जरिए एफआईआर दर्ज कराई जा सकती है.
सरकार के इस नए बिल के तहत इस तरह के किसी भी सरकारी कर्मचारी, जज या अधिकारी का नाम, स्थान की जानकारी या किसी भी तरह की पहचान तब तक प्रेस रिपोर्ट में नहीं दे सकते जब तक सरकार इसकी इजाजत न दे.
राजस्थान के खुद बीजेपी के दो विधायकों ने इसे गलत बताया है. उन्होंने इसे काले कानून की संज्ञा दी है.