चीन से रिश्ते बिगड़े तो मोदी को आई नेहरू की याद, मौत के 43 साल बाद भी चीन से करेंगे रक्षा

चीन से रिश्ते बिगड़े तो मोदी को आई नेहरू की याद, मौत के 43 साल बाद भी चीन से करेंगे रक्षा

नई दिल्ली : चीन के साथ जैसे जैसे विवाद बढ़ता जा रहा है सरकार को पंडित नेहरू की याद आने लगी है. आम तौर पर आरएसएस और बीजेपी नेहरू के पंचशील के सिद्धांत को कायरता पूर्ण और देश के लिए नुकसानदेह बताते रहे हैं. लेकिन अब पंचशील के सिद्धांत की दुहाई देकर मोदी सरकार चीन के साथ सीमा पर हालात सामान्य करने की कोशिश कर रही है. संसद में एक सवाल के जवाब में विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने कहा कि पंचशील का सिद्धांत अब भी चल रहा है.

विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने बृहस्पतिवार को राज्यसभा में कहा कि भारत एवं भूटान के बीच में पड़ने वाले ट्राई जंक्शन पर चीन एकपक्षीय ढंग से कब्जा जमाना चाह रहा है, जो भारत की सुरक्षा के लिए खतरा है.

कैसे नेहरू ने बनाया ऐतिहासिक सिद्धांत

पंचशील समझौते की प्रस्तावना में पाँच सिद्धांत थे जो अगले पाँच साल तक भारत की विदेश नीति की रीढ़ रहे. इसके बाद ही हिंदी-चीनी भाई-भाई के नारे लगे और भारत ने गुट निरपेक्ष रवैया अपनाया. जानकार कहते हैं कि अगर पंचशील का सिद्धांत न होता तो अबतक हज़ारों जानें जा चुकी होतीं और दोनों देश युद्ध और हथियारों के नाम पर नागरिकों का पेट काटकर खर्च कर रहे होते. पंचशील शब्द ऐतिहासिक बौद्ध अभिलेखों से लिया गया है जो कि बौद्ध भिक्षुओं का व्यवहार निर्धारित करने वाले पाँच निषेध होते हैं. तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने वहीं से ये शब्द लिया था.

समझौता क्या कहता है

  1. एक दूसरे की अखंडता और संप्रभुता का सम्मान
  2. परस्पर अनाक्रमण
  3. एक दूसरे के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करना
  4. समान और परस्पर लाभकारी संबंध
  5. शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व

इस समझौते के तहत भारत ने तिब्बत को चीन का एक क्षेत्र स्वीकार कर लिया. इस तरह उस समय इस संधि ने भारत और चीन के संबंधों के तनाव को काफ़ी हद तक दूर कर दिया था.

मगर इसके पीछे भी भारत की मित्रता की भावना मानी जाती है कि उसने चीन के शांति और मित्रता के वायदे को मान लिया और निश्चिंत हो गया.

पंडित नेहरू ने अप्रैल 1954 में संसद में इस संधि का बचाव करते हुए कहा था, “ये वहाँ के मौजूदा हालात को सिर्फ़ एक पहचान देने जैसा है. ऐतिहासिक और व्यावहारिक कारणों से ये क़दम उठाया गया.”

उन्होंने क्षेत्र में शांति को सबसे ज़्यादा अहमियत दी और चीन में एक विश्वसनीय दोस्त देखा.

इसके बाद भी जब भारत और चीन संबंधों की बात होती है तब इस सिद्धांत का उल्लेख ज़रूर होता है.

इस संधि को भले ही 1962 में ज़बरदस्त चोट पहुँची हो मगर अंतरराष्ट्रीय संबंधों में इसका अमर दिशानिर्देशक सिद्धांत हमेशा जगमगाता रहेगा.

बता दें कि महीने भर से ज्यादा वक्त से डोकलाम में भारत और चीन की सेनाएं आमने-सामने हैं. इस मामले का अभी तक कोई हल निकलता नजर नहीं आ रहा. ऐसे में एक बार फिर पंचशील के नेहरू के सिद्धांत की याद आ रही है.