CM शिवराज के उपवास का 360 डिग्री विश्लेषण, उपवास को समझना है तो इसे पढ़ें

रिज़वान अहमद सिद्दीकी,
प्रधान संपादक, न्यूज़ वर्ल्ड चैनल

भोपाल: मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने सभा से पूछा मै उपवास समाप्त कर दूं , सैकड़ों हांथ हाँ में उठे और एक बार फिर उन्होंने सौगातों का पिटारा खोल दिया  , उन्होंने किसानों को चिरपरिचित अंदाज़ में घोषणाओं से सराबोर कर दिया , इस मौके पर वो भावुक हुये , भांजे – भांजियों को भी याद किया , फिर वहाँ पहुंचे कतारबद्ध लोगों की अर्ज़ी थामते रहे और अंतिम आदमी तक मिले  , वक़्त की कमी और लाऊड स्पीकर के शोर में वो शायद ही किसी की बात सुन पाये हो लेकिन मैं हूँ न का उनका संदेश लाजवाब है और इसके साथ ही अनिश्चित कालीन उपवास डेढ़ दिन में ही अपने सियासी अंजाम तक पहुँच गया.

बात खेत की किसान की हो और बारिश न हो तो अधूरा सा लगता है , देर रात घन्टों झमाझम बारिश हुई और मुख्यमंत्री धरना स्थल पर बने अपने टेंट में डटे रहे ज़ाहिर है मैदान की वर्षा ने उन्हें ठीक से सोने नही दिया , यूँ ही वो देर रात तक लोगों से मिलते रहे . रात में ही अंतिम सभा के दौरान उनसे उपवास समाप्त करवाने की क़वायद तेज़ हो गई थी , केंद्रीय मंत्री द्वय नरेंद्र सिंह तोमर , थावरचंद गहलोत , बीजेपी राष्ट्रीय उपाध्यक्ष प्रभात झा , महामंत्री कैलाश विजयवर्गीय , मंत्री डॉ नरोत्तम मिश्रा इसमे सक्रिय थे तो प्रदेश अध्यक्ष नन्दकुमार सिंह चौहान रात में मंच से ही उनसे आग्रह करते नज़र आ रहे थे.

जिससे अहसास हो गया था अगले दिन धरना समाप्त हो जायेगा लेकिन सबकी निगाह शिवराज सिंह चौहान की तरफ , देर रात हमारी भी उनसे उस अस्थाई कक्ष में भेंट हो गई जहां वो सीमित आगन्तुकों से भेंट करते थे. हमने पूछा कल उपवास समाप्त करेंगे उन्होंने अस्वीकृति में सिर हिलाया , लग रहा था वो इतनी जल्दी निर्णय नही लेने वाले हैं , सबको उनके स्वास्थ्य की चिंता थी.  वो केवल पानी के सहारे उपवास कर रहे थे हम तो दिन भर निर्जला रोज़ा खोल कर उनसे भेंट करने पहुँचे थे हमसे ज़्यादा कौन समझ सकता है इस तरह अन्न त्यागने के बाद की परिस्थितियों की , ख़ैर वो विश्राम करने चले गये कुछ समय पश्चात हम भी रवाना हो गये , वहा देर रात तक राज्य मंत्री विश्वास सारंग मौजूद थे.

उपवास के अंतिम दिन नियत समय पर मुख्यमंत्री मंच पर आये कुछ देर महात्मा गांधी के भजन सुने और फिर  जनता को अवगत करवाकर मंच के पीछे स्थित अस्थाई कक्ष में शासकीय मीटिंग करने चले गये तब हमें याद आया सरकार भी तो यहीं से चलाने ऐलान हुआ था नही तो सरकार का मंच तो पार्टी का ही नज़र आ रहा था .  संचालन से लेकर समस्त गतिविधियों में कोई प्रशासकीय अधिकारी नज़र नही आ रहा था. मंच के ऊपर नीचे किसे बिराजना है , पुलिस अधिकारी पार्टी नेताओं से निर्देश ले रहे थे . बापू का भजन बड़े सुरेले अंदाज़ में गूंज रहा था लेकिन एक चूक हमे बार बार अखरती रही , “ईश्वर, अल्लाह तेरो नाम” निरन्तर “तेरे नाम” गाया जाता रहा . फिर मुख्यमंत्री मंच पर आये दिग्गजो ने आग्रह किया और आख़िर वो मान गये , फिर खड़े होकर उन्होंने नारियल पानी पिया और आशीर्वाद भी लिया . उनके उपवास में हम रोज़े के साथ डटे रहे .

उपवास में शिवराज की ये अदा खूब वायरल हुई

इधर मुख्यमंत्री ने उपवास शुरू किया उधर प्रदेश में शांति बहाल हो गई . प्रदेश के कई जिलों में फैली हिंसा राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियों में रही लेकिन अशांति से बिचलित , चिंतित मुख्यमंत्री का शांति के लिये उपवास अन्तर्राष्ट्रीय मीडिया में भी जगह पा गया इसके कई मायने और सवाल हैं. प्रदेश अध्यक्ष नन्दकुमार सिंह चौहान सार्वजनिक रूप से उपवास के निर्णय को मुख्यमंत्री का निजी निर्णय बताते रहे उन्होंने कहा उन्हें तो टीवी चैनल से पता चला लेकिन दूसरे दिन दिल्ली से आये एक राष्ट्रीय चैनल के एंकर को मुख्यमंत्री ने बताया राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह को उन्होंने अवगत करवाया था याने उनकी सहमति से उन्होंने यह क़दम उठाया है. अब नन्दू भैया ने ऐसा क्यों कहा यह पार्टी की अंदरूनी राजनीति है या इतने महत्वपूर्ण निर्णयों में भी विमर्श का सिलसिला टूट सा रहा है , यह तो नन्दकुमार सिंह चौहान ही जाने .

उपवास आंदोलन में भारी संख्या में लोग पहुँचे लेकिन उनमे से ज़्यादातर  कौन थे और किसके साथ आये थे यह सब जानते है , जिसका ऐलान भी बड़े नेता मंच से करते रहे कि रातो रात लोग वहां पहुंच गये , बाहर खड़े वाहन भी अहसास करवा रहे थे कि लोग कैसे आये हैं . वहां स्वस्फूर्त पहुंचने वालों की संख्या भी थी लेकिन मुख्यमंत्री तक उनकी बात ठीक से पहुंची यह बड़ा सवाल है. वादा था सबसे मिलेंगे , मिले भी , पौन घन्टे में सैकड़ों  लोग कैसे मिले होंगे , इसका आंकलन सहज ही किया जा सकता है .

सरकार और बीजेपी आज भी कह रहे हैं हिंसक आंदोलन किसानो का नही है लेकिन यह तो सत्य है आक्रोश सड़कों पर था. किसान प्रशासनिक अमले की उपेक्षा और रिश्वत ख़ोरी से नाराज़ है , यह राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजवर्गीय ने भी स्वीकारा है और मुख्यमंत्री को अवगत भी करवाया . सरकार संवेनशील है लेकिन अगर प्रशासन गम्भीर नही होगा तो वास्तविक लाभ नही मिलेगा. सरकार और जनता के बीच प्रशासन किस तरह आता है उसके दो उदाहरण है , फंदा गांव की वृद्धा  कमलादेवी कथित पुलिस पिटाई में घायल हो गईं उनका हांथ फैक्चर हो गया उनका पूरा परिवार भी पुलिस कार्रवाई का शिकार हुआ वो मुख्यमंत्री से नही मिल पाई शनिवार को पुलिस उन्हें जबरन कार्यक्रम स्थल से उठा ले गई , शाम को वो फिर पहुंची पार्टी के नेताओ और मीडिया के प्रयास के बाद भी वो मुख्यमंत्री से नही मिल पाईं और रविवार को पुलिस ने उन्हें घर में ही नज़रबन्द कर दिया . ऐसी ही कुछ दास्तान मैहर के बेल्दरा के किसान सुखेन्द्र सिंह की है , एक सीमेंट फैक्ट्री ने उसकी ज़मीन ले ली शर्तो के आधार पर उसे दी गई नौकरी से बाद में हटा दिया गया. सुखेन्द्र सिंह ने तंग आकर मुख्यमंत्री को पत्र लिखा और चेतावनी दी कि वो मुख्यमंत्री आवास के सामने आत्मदाह करेगा . रविवार को पुलिस ने उसे मुख्यमंत्री से मिलवाने के बहाने जेल भेज दिया . यह दोनों खबरें सुर्खियों में है .

उपवास की घोषणा से लेकर नारियल पानी पीने तक बिल्कुल नपी तुली स्क्रिप्ट के साथ चले इस हॉउसफुल शो को सरकार सुपर हिट मान रही है लेकिन समीक्षकों की अपनी अपनी राय है . टैक्स फ्री और बिना टिकट शो , ऊपर से सौगातों की बौछार , विपक्षी इसकी सफलता पर प्रश्न लगा रहे हैं. अब सांसद ज्योतिरादित्य भी 72 घन्टे के धरने पर बैठने की तैयारी में हैं पहले वो मृतको के परिजनों से मिलने मंदसौर जाएंगे फिर वापस आकर धरने पर बैठेगे इसे मुख्यमंत्री के उपवास के जवाब के तौर पर देखा जा रहा है. गोली कांड के मृतकों से कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गाँधी को भी मिलवाया गया था. पुलिस की गोलियों के शिकार हुये लोगों के परिजन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान से मिलने सभा स्थल तक पहुंच गये अभी चिता की आग भी ठंडी नही हुई और अन्य शांति संस्कार भी नही हुये और वो लोग स्वयं मुख्यमंत्री का उपवास समाप्त करवाने पहुँच गये उन्होंने उनसे इंसाफ़ भी माँगा . मृतिको के परिजन वहां कैसे पहुंचे इसमें किसी अहम भूमिका है जैसे अनेक सवाल भी चर्चा में हैं.

मुख्यमंत्री  शिवराज सिंह चौहान के राजनितिक भविष्य को लेकर एकबार फिर कयास तेज़ हो गये थे लेकिन कैलाश विजयवर्गीय ने साफ़ कर दिया कि आगामी विधान सभा चुनाव शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व में ही होगा . पार्टी के फोरम पर एकबार फिर मुख्यमंत्री मज़बूत बनकर उभरे हैं लेकिन शिवराज सरकार के लिये यह अलार्म भी है , हमेशा की तरह इसबार मीडिया उनके प्रति नर्म नही रहा है . कई बड़े पत्रकारों ने भी सवाल खड़े किये हैं.

किसानो के पक्ष में बहुत हद तक स्वामीनाथन समिति की रिपोर्ट को लागू करने का ऐलान कर शिवराज सिंह चौहान ने बड़ा काम हाँथ में ले लिया है, घोषणाओं को पूरा करने के लिये उन्हें केंद्र के सहयोग की दरकार भी है , क्या इसके लिये वो केंद्र सरकार को राज़ी कर पाएंगे. किसानों के असंतोष का प्रमुख कारण केंद्र की समर्थन मूल्य के इज़ाफ़े का अधूरा वादा और वर्तमान नियम भी हैं साथ ही नोटबन्दी और कैशलेस पॉलिसी भी इसकी वजह के तौर पर चर्चित है लेकिन सवाल यही है कि केंद्रीय नेतृत्व को बताये कौन .

फिलहाल प्रदेश में किसान आंदोलन शांत सा हो चला है लेकिन क्या यह स्थाई  है , देशभर से किसान नेता और विपक्षी दल मध्यप्रदेश की ओर रुख कर चुके हैं , आगामी 16 जून को देश व्यापी हड़ताल भी प्रदेश सरकार के लिये बड़ी चुनौती है. फिलहाल मप्र किसान आंदोलन की प्रयोगशाला बन सकता है इसके आसार हैं

बस थोड़ा इंतज़ार..

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