फटी जुराबें सिलवाकर पहनते और प्रेम पत्र विमान से भेजते थे नेहरू, इस लेख से जानने को बहुत कम बचेगा

बात बांडुंग सम्मेलन की है. श्रीलंका के प्रधानमंत्री सर जॉन कोटलेवाला भाषण दे रहे थे. अचानक वो बोल उठे कि पोलैंड, हंगरी, बुलगारिया और रोमानिया जैसे देश सोवियत संघ के उपनिवेश हैं, उसी तरह जैसे एशिया और अफ़्रीका में पश्चिमी देशों के उपनिवेश हैं. यह सुन कर नेहरू आगबबूला हो उठे.

वो उनके पास गए और आवाज़ ऊँची करके बोले, “सर जॉन, आपने ऐसा क्यों किया? अपना भाषण देने से पहले मुझे दिखाया क्यों नहीं?”

सर जॉन ने छूटते ही जवाब दिया, “मैं क्यों दिखाता अपना भाषण आपको? क्या आप अपना भाषण देने से पहले मुझे दिखाते हैं?”

इतना सुनना था कि नेहरू का चेहरा ग़ुस्से से और लाल हो गया. इंदिरा गाँधी ने उनका हाथ पकड़ कर उनके कान में फुसफुसाया कि ‘आप शांत हो जाइए’. लेकिन दो पड़ोसी देशों के प्रधानमंत्री स्कूली बच्चों की तरह लड़ते रहे.

वहाँ मौजूद चू एन लाई ने अपनी टूटी-फूटी अंग्रेज़ी में सर जॉन को समझाना चाहा, ‘मी यॉर फ़्रेंड!’ सब लोगों ने स्तब्ध होकर देखा कि किस तरह महान लोग भी साधारण इंसानों की तरह व्यवहार कर सकते थे.

तस्वीरें बीबीसी के लिए गेटी इमेजेज के सौजन्य से

सुबह होने तक ये तूफ़ान निकल गया. सर जॉन ने बहुत गरिमापूर्ण ढंग से माफ़ी मांगते हुए कहा, “मेरा उद्देश्य इस सम्मेलन में व्यवधान पहुँचाने का कतई नहीं था.”

बाद में सर जॉन कोटलेवाला ने अपनी किताब ‘एन एशियन प्राइम मिनिस्टर्स स्टोरी’ में लिखा, “मैं और नेहरू हमेशा बेहतरीन दोस्त रहे. मुझे विश्वास है कि नेहरू ने मेरी उस धृष्टता को भुला दिया होगा.”

नेहरू का ग़ुस्सा

नेहरू के ग़ुस्से पर पूर्व विदेश मंत्री नटवर सिंह ने एक क़िस्सा सुनाया कि एक बार नेहरू उनसे इस बात पर बहुत नाराज़ हो गए कि उन्होंने उनके नेपाल नरेश को लिखे गए पत्र को विदेश मंत्रालय के सेक्रेट्री जनरल को न दिखाकर अपनी अलमारी में रख लिया था.

नटवर सिंह

उस ज़माने में नटवर सिंह सेक्रेट्री जनरल के सहायक हुआ करते थे. वो याद करते हैं, “शाम साढ़े छह बजे नेहरू का नेपाल नरेश महेंद्र को लिखा पत्र मेरे पास आया. मैंने सोचा कि सुबह इसे पढ़ूंगा. सुबह मैं सेक्रेट्री जनरल को छोड़ने हवाई अड्डे चला गया जो सरकारी यात्रा पर मंगोलिया जा रहे थे. वहाँ उनका विमान लेट हो गया.”

नटवर सिंह आगे कहते हैं, “वहीं एक शख़्स मेरे पास आकर बोला कि आपको पंडित जी बुला रहे हैं. मैं तुरंत साउथ ब्लॉक पहुँचा. वहाँ नेहरू के निजी सचिव खन्ना ने मुझसे कहा कि प्रधानमंत्री के कमरे में मत घुसिएगा.”

सिंह ने बताया, ”वो इतने ग़ुस्से में हैं कि कोई चीज़ फेंककर मार देंगे. हुआ ये कि अगले दिन जैसा कि उनकी आदत थी, नेहरू विदेश सचिव के कमरे में जा पहुंचे और पूछा कि नेपाल नरेश को जो पत्र मैंने लिखा है, क्या आपने देखा है? विदेश सचिव ने कहा कि नहीं क्योंकि वो पत्र तो मेरे पास आया ही नहीं.”

नटवर सिंह आगे बताते हैं, “बाद में पता चला कि पत्र तो नटवर सिंह के पास है. विदेश सचिव ने नटवर को बचाने के उद्देश्य से कहा कि शायद नटवर को वो पत्र बहुत पसंद आया है. उन्होंने पढ़ने के लिए रख लिया होगा.”

उन्होंने बताया, ”ये सुनना था कि नेहरू का पारा सातवें आसमान पर पहुंच गया. बोले मैंने वो ख़त नटवर सिंह को ख़ुश करने के लिए नहीं लिखा है. फ़ौरन पुलिस बुलाइए. उनकी आलमारी तुड़वाइए और वो पत्र मेरे सामने पेश करिए. इस घटना के सात दिनों बाद तक मैं नेहरू के दफ़्तर के सामने से नहीं गुज़रा.”

8 सितंबर 1962 की तस्वीर जब कॉमनवेल्थ देशों के प्रधानमंत्री सम्मेलन के लिए नेहरू इंदिरा के साथ लंदन पहुंचे थे

नेहरू के सुरक्षा अधिकारी रहे केएम रुस्तमजी अपनी किताब ‘आई वॉज़ नेहरूज़ शैडो’ में लिखते हैं, “जब मैं उनके स्टाफ़ में शामिल हुआ तो वो 63 साल के थे, लेकिन 33 के लगते थे. लिफ़्ट का इस्तेमाल बिल्कुल नहीं करते थे. और तो और एक बार में दो सीढ़ियां चढ़ा करते थे.”

उन्होंने लिखा है, ”एक बार डिब्रूगढ़ की यात्रा के दौरान मैं उनका सिगरेट केस लेने उनके कमरे में घुसा तो देखा कि उनका सहायक हरि उनके फटे मोज़ों की सिलाई कर रहा है. उन्हें चीज़ों को बर्बाद करना पसंद नहीं था. एक बार सऊदी अरब की यात्रा के दौरान वो उस महल के हर कमरे में जा कर बत्तियाँ बुझाते रहे, जिसे ख़ास तौर से उनके लिए बनवाया गया था.”

‘ब्राह्मणज़ादे में शाने दिलबरी ऐसी तो हो’

उसी यात्रा के दौरान नेहरू को रसूल-अस-सलाम कह कर पुकारा गया था जिसका अरबी में अर्थ होता है ‘शांति का संदेश वाहक’. लेकिन उर्दू में ये शब्द पैग़म्बर मोहम्मद के लिए इस्तेमाल होता है. नेहरू के लिए ये शब्द इस्तेमाल करने के लिए पाकिस्तान में शाह सऊद की काफ़ी आलोचना भी हुई थी.

तब जाने माने कवि रईस अमरोहवी ने एक मिसरा लिखा था, जो कराची से छपने वाले अख़बार ‘डॉन’ में भी छपा था-

जप रहे हैं माला एक हिंदू की अरब, ब्राह्मणज़ादे में शाने दिलबरी ऐसी तो हो.

हिक़मते पंडित जवाहरलाल नेहरू की क़सम, मर मिटे इस्लाम जिस पर क़ाफ़िरी ऐसी तो हो.

नाई के लिए लाए घड़ी

नेहरू के पर्सनल असिस्टेंट के तौर पर काम करने वाले डॉक्टर जनकराज जय ने बीबीसी से बात करते हुए एक दिलचस्प किस्सा सुनाया, “नेहरू के बाल काटने के लिए राष्ट्रपति भवन से एक नाई आया करता था. एक बार नेहरू ने उससे कहा हम विलायत जा रहे हैं. बोलो तुम्हारे लिए क्या लाएं?”

नाई ने शर्माते हुए कहा, ”हज़ूर कभी-कभी आने में देर हो जाती है. अगर घड़ी ले आएं तो अच्छा होगा. जब नेहरू विलायत से लौटे तो वो नाई फिर उनके बाल काटने आया. नेहरू बोले तुम पूछोगे नहीं कि मैं तुम्हारे लिए घड़ी लाया हूं या नहीं. जाओ शेषन (उनके निजी सहायक) से जाकर घड़ी ले लो.”

जवाहरलाल नेहरू

डॉक्टर जनकराज जय एक और क़िस्सा सुनाते हैं, ”एक बार जब जवाहरलाल दफ़्तर जा रहे थे तो साउथ एवेन्यू के पास उनकी कार पंक्चर हो गई. दूर से एक सरदार टैक्सी वाले ने देख लिया. वो अपनी टैक्सी लेकर पहुंचा और बोला मेरा सौभाग्य होगा अगर आप मेरी टैक्सी में बैठ जाएं.”

सरदार ने कहा, ”मैं आपको दफ़्तर ले चलूँगा. नेहरू बिना किसी की सुने उसकी टैक्सी में बैठ गए. दफ़्तर पहुँचकर वो अपनी जेब टटोलने लगे लेकिन उनकी जेब में पैसे तो होते नहीं थे. टैक्सी वाला बोला आप क्यों शर्मिंदा कर रहे हैं. क्या मैं आपसे पैसे लूँगा? अब तो मैं पाँच दिनों तक किसी को इस सीट पर बैठाऊंगा भी नहीं!”

चार्ली चैपलिन ने गिलास उनके होंठों से लगा दिया

पूर्व विदेश सचिव दिनशॉ गुंडेविया ने अपनी आत्मकथा ‘आउटसाइड आर्काइव्स’ में लिखा है कि एक बार मशहूर अभिनेता चार्ली चैपलिन ने नेहरू को स्विट्ज़रलैंड में अपने घर खाने पर बुलाया. खाने से पहले एक ट्रे में शैम्पेन की कई बोतलें लाई गईं.

चैपलिन ने एक गिलास उठाकर नेहरू के हाथ में दे दिया. नेहरू बोले क्या आपको पता नहीं कि मैं पीता नहीं हूँ. चैपलिन ने कहा, “प्रधानमंत्री महोदय, मेरी शैंपेन पीने के सम्मान से आप मुझे कैसे वंचित कर सकते हैं?” नेहरू फिर भी झिझके. चार्ली झुके और उन्होंने शैम्पेन से भरा गिलास नेहरू के होंठों से लगा दिया.

नेहरू ने गिलास से एक सिप लिया और पूरे वक़्त तक उस गिलास को अपने बगल में रखे बैठे रहे.

रुस्तमजी भी लिखते हैं कि उन्होंने कभी नेहरू को शराब पीते नहीं देखा. हाँ, वो सिगरेट ज़रूर पिया करते थे और वो भी ‘स्टेट एक्सप्रेस 555’ जो कि उस ज़माने का ख़ासा मशहूर ब्रैंड होता था.

नेहरू को लॉर्ड माउंटबेटन की पत्नी एडविना माउंटबेटन से इश्क था. मशहूर पत्रकार कुलदीप नैयर ने बीबीसी को बताया कि जब वो ब्रिटेन में भारत के उच्चायुक्त थे तब उनको पता चला कि एयर इंडिया की फ़्लाइट से नेहरू रोज़ एडविना को पत्र भेजा करते थे.

एडविना उसका जवाब देती थीं और उच्चायोग का आदमी उन पत्रों को एयर इंडिया के विमान तक पहुंचाया करता था.

नैयर ने एक बार एडविना के नाती लार्ड रैमसे से पूछ ही लिया कि क्या उनकी नानी और नेहरू के बीच इश्क था? रैमसे का जवाब था, “उनके बीच आध्यात्मिक प्रेम था.”

इसके बाद नैयर ने उन्हें नहीं कुरेदा. नेहरू के एडविना को लिखे पत्र तो छपे हैं लेकिन एडविना के नेहरू को लिखे पत्रों के बारे में किसी को कुछ भी पता नहीं हैं.

कुलदीप नैयर ने एक बार इंदिरा गाँधी से उन पत्रों को देखने की इजाज़त मांगी थी लेकिन उन्होंने इससे साफ़ इनकार कर दिया था.

नेहरू ने पद्मजा से शादी नहीं की क्योंकि..

एडविना ही नहीं सरोजिनी नायडू की बेटी पद्मजा नायडू के लिए भी नेहरू के दिल में सॉफ़्ट कॉर्नर था. कैथरिन फ़्रैंक इंदिरा गाँधी की जीवनी में लिखती हैं कि विजयलक्ष्मी पंडित ने उन्हें बताया था कि नेहरू और पद्मजा का इश्क ‘सालों’ चला.

नेहरू ने उनसे इसलिए शादी नहीं की क्योंकि वो अपनी बेटी इंदिरा का दिल नहीं दुखाना चाहते थे. इंदिरा, नेहरू के जीवनीकार एस गोपाल से इस बात पर नाराज़ भी हो गई थीं क्योंकि उन्होंने नेहरू के ‘सिलेक्टेड वर्क्स’ में उनके पद्मजा के लिखे प्रेम पत्र प्रकाशित कर दिए थे.

1937 में नेहरू ने पद्मजा को लिखा था, “तुम 19 साल की हो (जबकि वो उस समय 37 साल की थीं)… और मैं 100 या उससे भी से ज़्यादा. क्या मुझे कभी पता चल पाएगा कि तुम मुझे कितना प्यार करती हो.”

एक बार और मलाया से नेहरू ने पद्मजा को लिखा था, “मैं तुम्हारे बारे में जानने के लिए मरा जा रहा हूँ.. मैं तुम्हें देखने, तुम्हें अपनी बाहों में लेने और तुम्हारी आँखों में देखने के लिए तड़प रहा हूँ.” (सिलेक्टेड वर्क्स ऑफ़ नेहरू, सर्वपल्ली गोपाल, पृष्ठ 694)

जानवरों से लगाव

नेहरू को पालतू जानवर बहुत पसंद थे. एक बार उनके कुत्ते सोना ने एडविना माउंटबेटन का उस समय हाथ काट लिया था जब वो उसे सहलाने की कोशिश कर रही थीं. नेहरू को दुःखी मन से उस कुत्ते को प्रधानमंत्री निवास से बाहर भेजना पड़ा था.

ख्रुश्चेव ने एक बार नेहरू को एक घोड़ा भेंट किया था. सऊदी शाह ने भी नेहरू को दो शानदार घोड़ियाँ भेंट में दी थीं जिन्हें कुछ दिन रखने के बाद नेहरू ने सेना को दे दिया था.

नेहरू के पास पिंजड़े में बाघ और तेंदुए के बच्चे भी रहा करते थे जो उन्हें मध्य प्रदेश के कुछ लोगों ने भेंट में दिए थे. छह महीने तक रखने के बाद नेहरू ने उन्हें दिल्ली चिड़ियाघर भिजवा दिया था.

मथाई ने अपनी किताब ‘माई डेज़ विद नेहरू’ में लिखा है, “एक बार नेहरू बीमार पड़ गए और पालतू पांडा भीमसा को खाना खिलाने के लिए उनके बाड़े में नहीं जा पाए. मैं भीमसा को घर के दरवाजे पर ले आया. वो सीढ़ियाँ चढ़ कर नेहरू के शयन कक्ष में पहुंच गया. मैंने नेहरू को बांस की पत्तियाँ दीं जिसे उन्होंने अपने हाथों से भीमसा को खिलाया और बहुत ख़ुश हुए.”

1964 में 27 मई को पूरे भारत को पता था कि नेहरू मौत से जूझ रहे हैं. ‘ब्लिट्ज़’ के संपादक रूसी करंजिया ने अपने सबसे काबिल स्तंभकार ख़्वाजा अहमद अब्बास को बुलाया और कहा कि ‘नेहरू किसी भी मिनट मर सकते हैं. तुम्हें चार घंटे के अंदर उनकी ऑबिट लिखनी है’.

अब्बास ने अपने को एक कमरे में बंद किया. तभी आर्ट विभाग का एक शख़्स आया और बोला पहले हेड लाइन लिखिए. अब्बास ने लिखा ‘नेहरू डाइज़,’ फिर लिखा, ‘नेहरू डेड’, फिर लिखा ‘नेहरू नो मोर.’ फिर उन्होंने तीनों हेडलाइंस को काट दिया और नए सिरे से एक हेडलाइन दी. अगले दिन यही ब्लिट्ज़ की हेडलाइन थी…. नेहरू लिव्स…! (पूरा लेख BBC हिंदी से जस का तस, वहां कुछ बेहतरीन तस्वीरें भी हैं )

बस थोड़ा इंतज़ार..

ताज़ा खबरे सबसे पहले पाने के लिए सब्सक्राइब करें

KNockingNews की नयी खबरें सबसे पहले पाने के लिए मुफ्त सब्सक्राइब करें