आज निर्भया कांड होता तो क्या होता? पांच साल में क्या पीछे गया देश ? पत्रकार गिरिजेश का वायरल पोस्ट

नई दिल्ली: पत्रकार गिरिजेश वशिष्ठ का एक और पोस्ट फिर से सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है. पोस्ट निर्भया कांड पर है. पढ़िए जस का तस –
आज निर्भया रेप केस के लिए अहम दिन है. सुप्रीम कोर्ट ये तय करेगा कि आरोपियों को फांसी दी जाए या नहीं. ये मामला रेयर ऑफ द रेयरेस्ट की श्रेणी में आता है या नहीं. आज जब इस मामले पर फैसला आना है तो एक सवाल और भी है वो ये कि 2012 के 16 दिसंबर से आजतक क्या बदला है. इस दिन ही निर्भया के साथ दरिंदगी हुई थी.
एक सवाल बार बार दिमाग में उठ रहा है. इन पांच सालों में क्या बदला. हो सकता है कुछ लोग कहें कुछ नहीं बदला. कुछ कहें ज्यादा बदला लेकिन मैं जैसा भारत और जैसी दिल्ली देख रहा हूं उसमें सुधार से ज्यादा बिगाड़ दिखाई दे रहा है. कल्पना कीजिए निर्भया केस अगर आज हुआ होता तो क्या होता ? मेरी राय में इन पांच सालों में वो लोग ज्यादा मज़बूत हुए हैं जो निर्भया को ही इस मामले के लिए दोषी मानते थे. वो लोग बढ़े हैं जो मानते हैं कि इतनी देर से लौटने की ज़रूरत क्या थी. वो लोग मजबूत हुए हैं जो मानते रहे हैं कि लड़कियों के कपड़े उनपर होने वाले यौन हमलों के लिए ज़िम्मेदार हैं.
कल्पना कीजिए कि क्या होता अगर आज निर्भया कांड होता. एक बड़ा तबका सोशल मीडिया पर निर्भया के खिलाफ अभियान उठा रहा होता. संस्कृति और मान्यताओं की जड़ दुहाई दी जा रही होती. ये पक्का कहा जा रहा होता कि आज ही निर्भया कांड पर इतना बवाल क्यों. इससे पहले भी तो रेप हुए हैं. शायद जन भावनाओं के इस उभार को राजनीतिक विरोधियों का षड्यंत्र बताया जा रहा होता. ये भी संभव था कि आधे लोग से विचार से प्रभावित होकर आंदोलन की ओर जाते ही नहीं बल्कि सोशल मीडिया पर उल्टे निर्भया को दोषी ठहरा रहे होते.

हो सकता है कुछ लोग इससे सहमत न हों लेकिन तमिलनाडु के किसानों के आंदोलन पर मैं खुद ऐसी ही प्रतिक्रियाएं देख चुका हूं. किसान खुद को प्रताड़ित कर रहे थे. खुद को कष्ट दे रहे थे. लेकिन उनके पूरे आंदोलन को साजिश और चुनावी पैंतरा करार देने की कोशिश हुई. मैंने देखा है कि भारत में अलग राय रखने भर पर लोग कितना प्रताड़ित हुए. सम्मान लौटाना भी राजनीतिक षड्यंत्र मान लिया गया. मैंने देखा है कि बरखा दत्त जैसी महिलाओं को ट्विटर पर किस नज़रिए से देखा गया. उनपर कैसे विचार व्यक्त किए गए. उनके चरित्र हनन की जो कोशिशें हुईं.

समाज बदला है और तेज़ी से बदला है. ये बदलाव उल्टी दिशा में है. लोग और पुरातन पंथी हुए हैं. लोग और जड़ हुए हैं लोग और परंपरावादी हुए हैं. मिहलाओं के प्रति उनका नज़रिया और अवैज्ञानिक हुआ है. उनकी आज़ादी गलत नज़रिए से देखी जा रही है. ऐसे लोग बढ़े हैं जो उन्हें लोग बहू-बेटी वाले फ्रेम में ही देखना चाहते हैं. स्वतंत्र स्त्री के चरित्र पर प्रश्नचिह्न लगाने वाले बढ़े हैं.
सही और गलत का फैसला इससे कभी नहीं हो सकता कि आप किस तरफ खड़े हैं. आपकी जाति की सापेक्षता से आप सत्य को नहीं जान सकते. अपने धर्म के नज़रिए से देखकर आप कभी भी सत्य के साथ नहीं रह सकते अपने देश के नज़रिए से भी देखकर आप सत्य को समझ सकते. सच को कड़वा इसीलिए कहा गया है क्यों कि वो हमारी तरफ हो ज़रूरी नहीं.

बस थोड़ा इंतज़ार..

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