आतंकवाद की सौ फीसदी सटीक काट, पत्रकार गिरिजेश का VIRAL लेख

सीरिया के इडलिब प्रांत में मंगलवार को हुए एक रसायनिक हमले में 75 लोग मारे गए हैं। बड़ी संख्या में बच्चे इस हमले से प्रभावित हुए हैं. ये हाल के सालों का सबसे खतरनाक हमला है और संभवत कैमिकल हथियारों के इस्तेमाल का पहला मामला है. इस हमले के साथ ही एक खबर का और जिक्र करना चाहूंगा . मलयेशिया पूरी दुनिया में अतिवाद और चरमपंथ से निपटने में सबसे ज्यादा सफल रहा है. जर्मनी और दुनियाभर के देश मलयेशिया के फार्मूले की और बढ़ रहे हैं. दोनों खबरों में दो चरम स्थितियां हैं. खुद पीएम मोदी ने मलयेशिया के प्रधानमंत्री नजीब रज़ाक से पूछा कि मलयेशिया में आतंकवाद से निपटने में उन्होंने क्या तरीका अपनाया. उन्होंने बताया कि आतंकवादियों के प्रति नरमी और उनका हृदय परिवर्तन करके मलयेशिया दुनिया में बेहतरीन उदाहरण बन गया. उसने एक तरफ आतंकवादियों का हृदय परिवर्तन किया दूसरी तरफ चरमपंथी कैदियों को दूसरे कैदियों से अलग रखकर उन्हें मनोवैज्ञानिक रूप से ठीक करने और उनका सम्मानजनक तरीके से पुनर्वास किया. आज पूरी दुनिया आतंक से लड़ने के तरीकों को लेकर मलयेशिया की तरफ देख रही है.
पहले मामले में आतंक से निपटने में सत्ता की ताकत और दमन का इस्तेमाल किया जाता है. ये इस्तेमाल इस स्तर तक पहुंच जाता है कि एक राष्ट्राध्यक्ष अपने ही नागरिकों पर कैमिकल हमले करता है. ये आतंक से निपटने की उस शैली का चरम है जो हम नक्सलवादियों और कश्मीरी आतंकवादियों ने निपटने में अपनाते रहे हैं. दोनों तरफ से लगातार शक्ति के इस्तेमाल की तीक्षणता बढ़ती जाती है. तनाव का लाभ लेकर रूस और अमेरिका की तरह की अंतर्राष्ट्रीय शक्तियां भी घरेलू मामलों में घुसपैठ बढ़ा लेती है. इसका कोई अंत अब तक नहीं आया है. सीरिया पूरा तबाह हो चुका है . वहां की तबाही की सारी तस्वीरें लगातार आप टीवी और इंटरनेट पर देख रहे हैं और अबतक नहीं पता कि ये तबाही कहां जाकर खत्म होगी.

मलयेशिया की शैली भले ही कहीं से आई हो. लेकिन उसपर गांधी की छाप साफ दिखाई देती है. भारत भी चरमपंथ और कट्टरवाद से निपटने के मामले में विश्वगुरु बन सकता था लेकिन वो धीरे धीरे कट्टरवाद से कट्टरवाद का कांटा निकालने के चक्र में फंस गया. इस शैली में सिर्फ तनाव और टकराव बढता है. लोग बीमारी की जगह बीमारों का इलाज करने में जुट जाते हैं. चरमपंथ, कट्टरवाद, अंधधार्मिकता और प्रतिक्रियात्मक हिंसा दर असल मानसिक बीमारियां हैं. ठीक वैसे जैसे उन्माद या पागलपन का रोग होता है. जिसके परिवार में उन्माद का मरीज़ होता है वो चाहते हैं कि मरीज की बीमारी दूर हो. वो इलाज की सोचते हैं मरीज़ को हानि नहीं पहुंचाते. कट्टरवाद भी समाज की एक बुराई है. बीमारी है. उसका इलाज भी बीमारी की तरह ही होना चाहिए. जिन लोगों ने अलवर में गौभक्त बनकर हिंसा का सहारा लिया और हमले किए वो खुद बीमार हैं. उनके प्रति नफरत नहीं होनी चाहिए. उन्हें उस मानसिक रोग से निकालने की कोशिश होनी चाहिए जो आइसिस और सीरिया को तबाही की तरफ ले जा रही है. ये वही बीमारी है जिसने अफगानिस्तान को बरबाद कर दिया. भारत के पास अभी भी मौका है कि वो श्री राम और गांधी के रास्ते को अपनाए. वो सूफियों के मोहब्बत के रास्ते पर आगे बढ़े. आज मलयेशिया जिस तरीके से दुनिया में मिसाल पेश कर रहा है वो कोई और तरीका नहीं हमारा अपना भारतीय तरीका है. प्रेम का तरीका . स्नेह का तरीका. सुधार का तरीका. बदले का तरीका नहीं. अच्छी बात ये है कि भारत के प्रधानमंत्री मलयेशिया के इस तरीके में रुचि दिखा रहे हैं.

बस थोड़ा इंतज़ार..

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