नतीजे आने के बाद सबसे बड़ा सवाल, इनमें से कौन बनेगा मुख्यमंत्री?

नतीजे आने के बाद सबसे बड़ा सवाल, इनमें से कौन बनेगा मुख्यमंत्री?

नई दिल्ली: उत्तर प्रदेश में जीत के नतीजों की धमक के बाद अगला सवाल है कि यूपी में बीजेपी किसे सीएम के लिए चुनोगी . सीटों की बरसात के बाद बीजेपी के भीतर सीएम पद के लिए संभावित चेहरों की चर्चा जोरों पर है. अगर बीजेपी यूपी की सत्ता पर काबिज होती है तो अगला सीएम कौन होगा इस पर यूपी की जनता के साथ-साथ पूरे देश की निगाहें टिकी हैं. ये वो नाम हैं जिनमें से कोई एक लखनऊ के पंचम तल पर बैठेगा. अब कुछ पलों में 17वीं विधानसभा की तस्वीर साफ हो जाएगी.
राजनाथ सिंह
देश के गृह मंत्री और यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री राजनाथ सिंह को यूपी में बीजेपी की कमान सौंपी जा सकती है. अगर राज्य में पार्टी बहुमत से थोड़ा दूर भी जाती है तो राजनाथ सिंह ही वही चेहरा हैं जिनके नाम पर अन्य दलों से समर्थन जुटाया जा सकता है. राजनाथ सिंह पार्टी के भीतर साफ-सुथरी छवि और देश मे मजबूत नेता माने जाते हैं और उनके नाम पर कोई विरोध नहीं होगा. यूपी से आने वाले राजनाथ सिंह की पहचान बड़े ठाकुर नेता के तौर पर भी है. हालांकि कयास ये भी हैं कि राजनाथ सिंह राष्ट्रीय राजनीति छोड़कर राज्य की राजनीति में नहीं जाना चाहेंगे, क्योंकि केंद्र सरकार में उन्हें नंबर दो का कद मिला हुआ है और वो इसे कम नहीं करना चाहेंगे.
केशव प्रसाद मौर्य
यूपी बीजेपी के अध्यक्ष और फूलपुर से लोक सभा सांसद है केशव प्रसाद मौर्य भी सीएम पद की रेस में आगे हैं. केशव प्रसाद पिछड़ी जाति मौर्य से आते हैं जिसकी तादाद गैर यादव जातियों में सबसे अधिक है. संघ के सबसे करीबी और विश्व हिन्दू परिषद् के तेज तर्रार नेताओं में शुमार केपी मौर्य ने पार्टी के लिए धुआंधार प्रचार किया है. चुनाव में मौर्य अच्छे वक्ता साबित हुए और उन्हें पार्टी के लिए सबसे ज्यादा 155 चुनावी सभाएं की हैं. बीजेपी में पिछड़ी जाति का चेहरा कहे जाने वाले मौर्य को अमित शाह और पीएम नरेंद्र मोदी की खोज माना जाता है और ये दोनों ही बड़े नेताओं के करीबी माने जाते हैं. केशव प्रसाद पर दर्ज आपराधिक मामले उनकी राह में रोड़ा बन सकते हैं.
दिनेश शर्मा
लखनऊ के मेयर दिनेश शर्मा आरएसएस से जुड़े परिवार से आते हैं. ब्राह्मण जाति के दिनेश शर्मा यूपी में पार्टी के उपाध्यक्ष हैं और गुजरात में पार्टी प्रभारी हैं. पीएम मोदी के करीब माने जाने वाले दिनेश शर्मा के बुलावे पर ही पीएम ने दशहरे पर लखनऊ के रामलीला कार्यक्रम में हिस्सा लिया था. संगठन का चेहरा और पर्दे के पीछे रहने वाले नेता के रूप में इनकी पहचान है. दिनेश शर्मा ने कभी कोई चुनाव नहीं लड़ा, न तो विधायक न ही सांसद रहे, लेकिन पार्टी के बड़े नेताओं के करीबी रहे हैं.
योगी आदित्यनाथ
गोरखपुर से बीजेपी सांसद योगी आदित्यनाथ पार्टी का फायर ब्रांड हिन्दूवादी चेहरा माने जाते हैं. लगातार कई बार सांसद रहे और यूपी में प्रचारक के नाते सबसे ज्यादा इनकी मांग रही है. पूर्वांचल का बड़ा चेहरा हैं और खुलकर मंच से सांप्रदायिक भाषण भी देते हैं. आदित्यनाथ पार्टी का लोकप्रिय हिंदू चेहरा हैं और छात्र जीवन से ही विद्यार्थी परिषद् में काम कर रहे हैं. पहले भी मुख्यमंत्री पद के दावेदार रहे हैं, इस बार इनका दावा मजबूत है क्योंकि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भी योगी आदित्यनाथ ने जमकर प्रचार किया है. उनके खिलाफ भड़काऊ भाषण देने के मामले में के कई मुकदमे भी दर्ज हैं.
संतोष गंगवार
केद्रीय मंत्री और बरेली से सांसद संतोष गंगवार पार्टी के भरोसेमंद नेता हैं. विनम्र छवि वाले नेता के तौर पर इनकी पहचान है और संतोष गंगवार को संगठन का माहिर आदमी माना जाता है. लगातार पांच बार से सांसद गंगवार कुर्मी जाति से आते हैं और अटल बिहारी वाजपेयी से लेकर नरेंद्र मोदी की कैबिनेट में रहे हैं. यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह के बाद बीजेपी में पिछड़ी जाति का सबसे बड़ा चेहरा माने जाते हैं. इनकी पहचान केशव मौर्य की तरह हिंदूवादी नेता की नहीं है ना ही प्रदेश मे कभी ये मुख्यमंत्री की होड़ में रहे हैं लेकिन ये पार्टी के डार्क हॉर्स जरूर साबित हो सकते हैं.
मनोज सिन्हा
मनोज सिन्हा पूर्वी उत्तर प्रदेश के गाजीपुर से आते हैं और भूमिहर जाति से ताल्लुक रखते हैं. केंद्रीय मंत्री सिन्हा को मोदी कैबिनेट में रेल राज्यमंत्री मंत्री का जिम्मा सौंपा गया है. छात्र जीवन से ही राजनीति में सक्रिय रहे और बीएचयू छात्र संघ के अध्यक्ष भी रहे चुके हैं. सिन्हा को काफी सुलभ और सहज नेता माना जाता है और बड़े नेताओं के पसंदीदा नेता भी हैं. हालांकि यूपी के सामाजिक समीकरण इनके पक्ष में नहीं है और संगठन में इनकी क्षमता कम मानी जाती है.