नोटबंदी की मार गरीब मज़दूरों पर पेट भरने के लिए खून बेचने और नसबंदी कराने का सहारा

नोटबंदी की मार गरीब मज़दूरों पर पेट भरने के लिए खून बेचने और नसबंदी कराने का सहारा




देश बदलने की प्रक्रिया में अगर किसी की ज़िंदगी सबसे ज्यादा बदल रह है तो वो हैं मज़दूर. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का एलान इस वर्ग के लिए सबसे बड़ी मुसीबत साबित हुआ है. बड़ी संख्या में मज़दूर बड़े शहरों से अपने गांव की ओर पलायन कर रहे हैं.

दिहाड़ी मजदूरी पर काम करने वाले लोगों को काम नहीं मिल रहा है और काम मिल भी रहा है तो पैसे नहीं मिल रहे हैं. खास तौर पर कारपेन्टर, भवन निर्माण, और उससे जुड़ी दूसरी मज़दूरी करने वाले बुरी हालत में हैं. यही आलम छोटे शहरों का भी है. वहां भी मजदूरों को काम नहीं मिल रहा है.

यूपी के अलीगढ़, मथुरा, आगरा में भी मजदूरों का बुरा हाल है. ऐसे में वो घर की जरूरतें कहां से पूरी करें उनके सामने एक बड़ा सवाल है. हालात ये हैं कि अपने घर का खर्च चलाने के लिए बहुत से मज़दूर या तो खून बेच रहे हैं या नसबंदी करा रहे हैं. सबसे दुखद हालात दिल्ली के बड़े अस्पतालों के बाहर खून बेचने वाले गरीब मज़दूरों की है. मंदी का फायदा उठाकर दलाल उन्हें कम पैसे टिका रहे हैं.

टाइम्स ऑफ इंडिया में छपी एक खबर के मुताबिक ऐसी ही समस्या से दो-चार हो रहे अलीगढ़ के पूरन शर्मा ने पैसों का जुगाड़ करने के लिए नसबंदी करा ली है. इसके एवज में उसे 2000 रुपये नकद मिले हैं. सरकारी योजना के मुताबिक नसबंदी कराने वाले पुरुषों को 2000 और महिलाओं को 1400 रुपये नकद मिलते हैं. अखबार के मुताबिक नोटबंदी के बाद आगरा, मथुरा और अलीगढ़ में नसबंदी के मामले बढ़ गए हैं. पूरन का कहना है कि उसके पास खाने तक को पैसे नहीं है. इसलिए उसने नसबंदी कराई. पूरन कहता है कि उसकी पत्नी भी ऐसा कर कुछ पैसे चाहती थी लेकिन वो विकलांग है इसलिए ऐसा नहीं कर पाई.

अखबार के मुताबिक, अलीगढ़ में पिछले साल नवंबर में जहां कुल 92 लोगों ने नसबंदी कराई थी, वहीं इस नवंबर में अबतक 176 लोग नसबंदी करवा चुके हैं. यह महीना खत्म होने में अभी भी 4 दिन बाकी हैं. इसी तरह आगरा में भी पिछले नवंबर में जहां 450 लोगों ने नसबंदी करवाई थी, वहीं इस साल नवंबर में अब तक यहां 904 महिलाएं और 9 पुरुष नसबंदी करवा चुके हैं.

हालांकि, स्वास्थ्य अधिकारियों का कहना है कि जागरुकता की वजह से लोग अब ज्यादा संख्या में नसबंदी कराने आ रहे हैं लेकिन पूरन शर्मा इसे खारिज करते हैं. उनका कहना है कि उन्होंने जागरुकता की वजह से नहीं बल्कि पैसों की किल्लत की वजह से नसबंदी कराई है. बतौर पूरन उसे एक आशा कार्यकर्ता ने इस योजना की जानकारी दी थी और बताया था कि ऐसा कराने से उसे 2000 रुपये हाथ के हाथ मिल जाएंगे. पूरन एक दिहाड़ी मजदूर हैं. उनके परिवार में विकलांग पत्नी के अलावा 3 बच्चे भी हैं. अपने परिवार में वह अकेले कमाने वाले सदस्य हैं. पूरन का कहना है कि पिछले 3 हफ्ते से उन्हें काम नहीं मिल रहा है.