वो हिजाब पहनकर खेलती है बिकनी वाला बॉलीवाल, खड़ी हो गई नयी बहस

वो हिजाब पहनकर खेलती है बिकनी वाला बॉलीवाल, खड़ी हो गई नयी बहस




रेत में बीच बॉलीवाल खेलती बिकनी वाली लड़कियों के बीच अगर कोई हिजाब पहनकर उतर जाए तो आप चौक जाएंगे । शायद आपको लग बीच पर हिजाब का क्या काम ? लेकिन पसंद और आस्था कुछ भी करवा सकती है . मिश्र की बीच  वॉलीबॉल खिलाड़ी डुआ एल्गोबैशी हिजाब इतना पसंद करती हैं कि ओलंपिक में बीच बॉलीवाल खेलने भी हिजाब में ही पहुंचीं. क्योंकि बीच वॉलीबॉल की एक खास पहचान इस खेल से जुड़ा ग्लैमर और इसके बोल्ड परिधान भी हैं. ऐसे में कोई हिजाब पहनकर मैदान में उतर जाए तो चौंकना लाजमी है. इनका ये परिधान नयी बहस को जन्म दे सकता है क्योंकि हिजाब को परंपरागत रूप से महिला की दासता का प्रतीक माना जाता है और एक लड़की बीच बॉलीवाल जैसे खेल में हिजाब पहने तो महिलाओं की  आजादी की बात करने वाले लोग चिंतित भी हो सकते हैं.

 

 

इसलिए कहना गलत नहीं होगा कि मिस्र की डुआ एल्गोबैशी और नाडा मिवाद ने वाकई सबको चौंका दिया. ओलंपिक खेलों में मिस्र पहली बार बीच वॉलीबॉल में अपनी दावेदारी पेश कर रहा है. रविवार को जब ओलंपिक में पहली बार मिस्र की महिला टीम जर्मनी के खिलाफ खेलने उतरी तो ये कई लोगों को हैरान कर गया. डुआ पूरी बाजू के कपड़ें पहनी हुईं थी और उनके बाल भी ढके हुए थे. उनकी साथी खिलाड़ी नाडा भी कुछ इसी अंदाज में नजर आईं, बस उनके बाल डुआ की तरह ढके हुए नहीं थे.

हिजाब ने भी जीत नहीं दिलायी

एक और खास बात ये कि दोनों ओलंपिक बीच वॉलीबॉल में हिस्सा लेने वाली सबसे कम उम्र की खिलाड़ी हैं. नाडा की उम्र 18 जबकि डुआ की 19 साल है. हालांकि इस मैच में मिस्र को जरूर 12-21, 15-21 से हार का सामना करना पड़ा लेकिन बीच ओलंपिक के इतिहास में एक नया अध्याय तो डुआ ने जोड़ ही दिया.

बिकनी पर विवाद पुराना

बीच वॉलीबॉल पर हमेशा से सेक्सिस्ट, महिलाओं को बोल्ड और आकर्षण के तौर पर प्रस्तुत करने का आरोप लगता रहा है. 1999 में पहली बार इंटरनेशनल वॉलीबॉल फेडरेशन (FIVB) ने इस खेल के यूनिफॉर्म को लेकर कायदे बनाए थे. तब ये जरूरी कर दिया गया था कि खिलाड़ी ‘बीचवीयर’ ही पहनेंगे.

क्या बीच वॉलीबॉल में सिर्फ तन देखते हैं लोग?

इसमें महिलाओं के लिए बिकनी पहनना जरूरी कर दिया गया था. बकायदा बिकनी कितनी बड़ी हो, ये तक निर्धारित कर दिया गया. नियमों के अनुसार तब ये केवल सात सेंटीमीटर चौड़ी हो सकती थी. हां, अगर मौसम बहुत ठंडा हो तब पूरे बाजू के कपड़े पहने जा सकते थे लेकिन तब भी बिकनी का ऊपर होना जरूरी था. इस पर तब खूब बहस हुई थी. लेकिन कायदा बन गया तो बन गया.