गुजरात दंगों के इन दो चेहरों ने मिलाया सांप्रदायिकता के खिलाफ हाथ, अब दलित मुसलिम एकता के दूत बने

गुजरात दंगों के इन दो चेहरों ने मिलाया सांप्रदायिकता के खिलाफ हाथ, अब दलित मुसलिम एकता के दूत बने




 

भी गुजरात दंगों की पहचान बना ये शख्स आज लोगों को भाई चारे की अहमियत बताता है. उसका कहना है कि दंगा बगैरह सब भरमाने का नतीजा है, लोगों को मिलकर रहना चाहिए. अब वो गोरक्षकों के खिलाफ सड़क पर उतर आया है. वो गुजरात की बीजेपी सरकार से बेहद नाराज़ है. इस शख्स का नाम अशोक मोची है. अशोक मोची बजरंग दल का पूर्व सदस्य. दंगों के दौरान और बाद में उसकी तस्वीर पूरी दुनिया के अखबारों और पत्रिकाओं में छपी. अशोक तब भी मोची का काम करते थे, आज भी करते हैं. 41 साल के हो चुके अशोक आज बेघर हैं. अविवाहित हैं और फुटपाथ पर अपनी जिंदगी काट रहे हैं. ये जरूर है कि उनकी जिंदगी में कोर्ट-कचहरी का सिलसिला शुरू हो गया. 2005 में सेशन कोर्ट ने सबूतों के आभाव में उन्हें क्लिन चिट दी लेकिन, दिलचस्प ये कि बीजेपी की गुजरात सरकार इस फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट चली गई. केस अभी भी चल ही रहा है. अशोक कहता है – ‘मैं अब वोट नहीं डालता. न 2004 में डाला और न 2009 में. अब मुझे सिस्टम में कोई भरोसा नहीं रहा.’ मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक वह गुजरात में चल रहे ‘दलित अस्मिता यात्रा’ में शामिल होगा . ऊना में दलितों की पिटाई के खिलाफ ये यात्रा पांच अगस्त को अहमदाबाद से शुरू हुई थी. 15 अगस्त को इसे ऊना पहुंचना है. अशोक कुछ मुस्लिम युवकों के साथ सावरकुंडला में इस यात्रा से जुड़ेंगे.

 

अशोक का विरोध यहीं तक नहीं है. वो दंगों के पोस्टर बॉय से अब दलित मुस्लिम एकता का प्रतीक बन रहा है . अशोक ने उसी कुतुबुद्दीन का साथ लिया है जिसका चेहरा दंगों के दौरान पीड़ित व्यक्ति के तौर पर दुनिया भर में छपा और आज भी दंगों के दर्द का प्रतीक है . अशोक और कुतुबुद्दीन 2014 में चुनाव के दौरान एक साथ और एक मंच पर नजर आए. दोनों ने एक-दूसरे को भाई माना. जिन पर गुजरती है, वो आगे जाकर समझते हैं कि वोट वैंक की सियासत में उनका किस प्रकार इस्तेमाल किया गया. अशोक और कुतुबुद्दीन इसी का उदाहरण हैं.

हाल ही में अशोक ने मीडिया से बात करते हुए बीजेपी सरकार पर निशाना साधा था और कहा था कि गुजरात में गरीबों और दलितों के लिए कुछ नहीं बदला है. सोचिए, रोज कमाने और खाने वाले एक शख्स को दंगों के दौरान तब हाथ में डंडा किसने पकड़ाया होगा. जिसके पास दो जून की रोटी नहीं, उसे ‘धर्म’ की लड़ाई में कूदने के लिए किसने उकसाया होगा.

2014 में चुनाव के दौरान भी जब गुजरात के विकास की बात होती थी तो अशोक ने मुंबई मिरर से बात करते हुए कहा था- ‘गुजरात में विकास कहां है. ऐसी बातें करना भी शर्मनाक है. मैं अब भी लाल दरवाजा के पास फुटपाथ पर रहता हूं. मेरी आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं है कि शादी कर सकूं और इसलिए अब भी अकेला हूं.’ कहने की जरूरत नहीं, कि तब वो किस पर निशाना साध रहे थे. यही नहीं, अशोक ने गुजरात दंगों के लिए माफी तक मांगी और मीडिया की सुर्खियों में आए.

बहरहाल, दंगों के दौरान हिंदू वोटों को समेटने की कोशिश थी अब गाय पर बहस को जन्म देकर भी यही कोशिश हो रही है. लेकिन अशोक परमार जैसों ने कहानी के हर पन्ने को खोल दिया है. आप अपने हिसाब से इसके मायने खोजते रहिए…