इस वीडियो को देखने के बाद आप कभी मीडिया को बिकाऊ नहीं कह पाएंगे. लाश को कंधे पर ढोता भारतपुत्र

इस वीडियो को देखने के बाद आप कभी मीडिया को बिकाऊ नहीं कह पाएंगे. लाश को कंधे पर ढोता भारतपुत्र

कोई बिकाऊ मीडिया कहता है तो कोई कहता है पेड मीडिया , कुछ लोग तो प्रेस्टीट्यूट भी कह देते हैं . इस खबर को पढ़कर इन सभी के मुंह बंद होने वाले हैं. नेताओं को महान मानने वाले और कुछ नेताओं को तो देशभक्ति का पर्याय मानने वाले लोगों के लिए ये तमाचा है. ओडिशा की इस कहानी में आप भारत की गरीबी देख सकते हैं, आप सरकारी बेरुखी देख सकते हैं और आप देख सकते हैं कि किस तरह सरकारी नीतिओं में भारत के असली मालिक आम लोगों की अनदेखी होती है, आप ये भी देख सकते हैं कि विकास के बड़े बड़े वादे और तरह तरह के प्रचार अभियान के बीच भारत की असलियत क्या है . आप ये भी जान सकते हैं कि कैसे मीडिया ही है जो सब तरफ से नाउम्मीदी हाथ लगने पर लोगों की मदद को आगे आता है. ये भी पता लगता है कि मामला सामने आते ही सरकारी व्यवस्था कैसे नाटकबाज़ी में जुट जाती है. सबसे पहले बात नाटकबाज़ी और लीपापोती की. ओडिशा के शहरी विकास मंत्री पुशपेंद्र सिंघदेओ के मुताबिक कालाहांडी की कलेक्टर ने इस बात की जांच का आदेश दिया है. अब आपको बताते हैं कि ये जांच का आदेश किस मामले दिया गया है. बारह किलोमीटर की पदयात्रा के बाद उस व्यक्ति को एंबुलेंस तब मिली जब कुछ लोगों ने मामले में दख़ल दिया. अब जिला प्रशासन ने उन्हें मुआवजे के तौर पर 12 हज़ार रुपये देने की बात कही है.

कहानीं दाना मांझी नाम के भारत के एक सम्मानित नागरिक की है . उसकी पत्नी अमांग भवानीपटना के एक अस्पताल में टीबी के इलाज के लिए भर्ती थीं, जहां उनकी मौत हो गई. ठीक से इलाज नहीं हो पाया इसलिए उसकी मौत हो गई . दाना के मुताबिक उनका गांव वहां से करीब 60 किलोमीटर की दूरी पर है. वो ग़रीब है और उसके पास वाहन का किराया देने के लिए पैसे नहीं थे. अस्पता ने उसकी मदद नहीं की. हारकर वो अपनी पत्नी की लाश को कंधे पर उठाकर चल पड़ा. जब ये बात स्थानीय पत्रकारों को पता चली तो वो मदद के लिए दौड़ पड़े. कुछ लोग कह सकते हैं कि पत्रकार वहां खबर बनाने में लग गए . खुद भी तो मदद कर सकते थे लेकिन सोचना पड़ेगा कि अगर वो मदद करते और खबर न बनाते तो आज देश के कान खड़े नहीं होते. हमें इस घटना के बारे में पता नहीं चलता. हम कभी नहीं जानपाते कालांहांडी में आज भी लोगों की हालत क्या है.

लेकिन अस्पताल कह रहा है कि इसमें उसकी कोई गलती नहीं है. उसके पति अस्पताल के कर्मचारियों को जानकारी दिए बिना उसका शव ले गए.”

उधर, दाना मांझी का कहना है कि पत्नी की मौत मंगलवार रात को हुई. अस्पताल के कर्मचारियों ने उनसे बार-बार शव हटाने के लिए कहा. इसके बाद बुधवार को वो शव लेकर चल पड़ा.

उसने कहा, “मैं अस्पताल के कर्मचारियों से अपनी पत्नी का शव ले जाने के लिए वाहन की गुजारिश करता रहा लेकिन कुछ हासिल नहीं हुआ. मैं गरीब आदमी हूं इसलिए किराए पर वाहन नहीं ले सकता. मेरे पास शव को कंधे पर ले जाने के अलावा कोई और चारा नहीं था.”

दाना मांझी ने बताया कि बुधवार की सुबह उसने अपनी पत्नी के शव को कपड़े में लपेटा और कंधे पर रखकर गांव की ओर चल दिए. उसके साथ 12 साल की बेटी चौला भी थी.

वो करीब 12 किलोमीटर की दूरी तय कर चुका था, तब मीडिया के लोगों के प्रयासों से एक एंबुलेंस मिली.

video courtsey : BBC