इस कहानी के सभी पात्र असली है. आदमी की घुटन की कहानी. भारत में ये आम होता है

इस खबर में दर्द है. उसका दर्द जो दिन रात सबके दर्द दूर करता है. कहानी सिर्फ एक डॉक्टर के साथ हुई ना इंसाफी की नहीं है बल्कि एक नागरिक के साथ सरकारी एजेंसियों के दमनात्मक, बेरहम और असम्मानजनक रवैये की है. इस सच्ची कहानी का नायक ग्वालियर में पिछल 10-12 साल से लोगों के दर्द से राहत पहुंचा रहा एक फिजियोथेरेपिस्ट आर्जित वशिष्ठ है, अर्जित बेहद समर्पित और दिन और रात न देखने वाला डॉक्टर है . 22 अगस्त 2016 को वो रोज़ की तरह माधव नगर के रास्ते में था. घर से निकलते वक्त मां ने कहा कि बिजली का बिल जमा करते हुए जाना. अर्जित ने बिल अपनी जेब में रखा और पास ही मौजूद ग्वालियर के चावड़ी बाज़ार बिजली घर पहुंचा. जेब से पैसे निकाले और बिल लेकर खिड़की की ओर बढ़ा दिया. लेकिन अंदर मौजूद कर्मचारी ने अनिच्छा जताई और मोबाइल की ओर घूरते हुए कैश काउंटर की खिड़की बंद कर दी. चूंकि कैश काउंटर बंद होने में आधे घंटे का वक्त था तो डॉक्टर ने इसका विरोध किया. नागरिक होने के नाते हक भी जताया. पूछा- ‘ऐसे कैसे खिड़की बंद कर सकते हैं आप? कर्मचारी से इसके बाद कुछ बहस हुई और वो भुगतान लेने को तैयार हो गया .कर्मचारी ने पैसे तो लिए लेकिन वो बकाया 10 रुपये वापस देना नहीं चाहता था. डॉक्टर ने कहा- बाकी पैसे ? ‘पकड़ अपने पैसे’ – कर्मचारी ने दोबारा खिड़की खोली और एक 10 का सिक्का उछाल दिया. सिक्का ज़मीन पर गिरा और लुढ़कता हुआ कुछ दूर गया. डॉक्टर ने सिक्का जेब में रखा और पूछा – “ये कौन सा तरीका है?”

कैशियर को बर्दाश्त नहीं हुआ. अपने पास पहले से ही रखा हुआ डंडा निकाला और खिड़की से ही हाथ बाहर निकालकर दो तीन डंडे जड़ दिए. पूरा वाक्या सीसीटीवी में कैद हो रहा था. लेकिन कर्मचारी को परवाह नहीं थी.

जब डॉक्टर बिजलीघर में मौजूद दूसरे अफसरों से शिकायत करने पहुंचा तो सारे कर्मचारी इक्टठा हो चुके थे. सभी डॉक्टर पर टूट चुके थे. जिसे डॉक्टर साहब कहकर अपने दर्द बताया करते थे उसे ज़मीन पर गिरा दिया. मां से बर्दाश्त नहीं हुआ तो वो भी मौके पर पहुंच गई , हैवान कर्मचारियों ने उसपर भी हमला बोल दिया . लेकिन अचानक वहां पहुंचे पिता ने मामला संभाला . समाज में नोवल और प्रतिष्ठित माने जाने वाले चिकित्सा के पेशे में सम्मान ढ़ूंढ रहे इस डॉक्टर को अभी और भी जलालत झेलनी थी. अपनी रक्षा के लिए डॉक्टर ने जब पुलिस को 100 नंबर पर फोन किया तो वहां आए पुलिस वाले उल्टा डॉक्टर को धमकाने में लग गए. मामला थाने पहुंचा.

थाने में थाना इंचार्ज नहीं था. इस बीच डॉक्टर के जानने वाले इकट्ठा हो चुके थे. उम्मीद थी कि थाना प्रभारी आते ही न्याय हो जाएगा. जैसे ही थाना प्रभारी पहुंचे उन्होंने सबसे पहला काम डॉक्टर साहब को एक कोने में बैठाने का किया. पुलिस वाले ने साहब की बात पर अमल किया अंदर ले जाकर कहा यहां बैठ – और धक्का देकर बैठा दिया. डॉक्टर साहब की सारी उम्मीदें हवा हो गई थी. उन्होंने घबराते हुए पूछा. “एक कॉल कर सकता हूं” पुलिस वाले ने कहा “करवाऊं फोन?” अब सारे भरोसे टूट चुके थे.

डॉक्टर साहब के बड़े भाई अंकित वशिष्ठ बेहद कर्मठ समाज सेवी हैं. कई जिलों में स्वास्थ्य विभाग से साथ काम करते है ताकि बच्चियों को सरकारी योजना के मुताबिक आयरन की गोलियां मिल सकें. कुपोषण के शिकार मध्यप्रदेश में वो लाखों बच्चों की सेहत के लिए काम कर चुके हैं. उन्होंने कानून पर अपने भरोसे का इजहार किया – “आप तो फैसला ही सुना रहे हैं, अदालत के लिए मामला छोड़िए. दोनों तरफ से मामला दर्ज कीजिए. लेकिन थानेदार साहब का जवाब डरा देने वाला था, बोल- तुझ भी डालूं क्या अंदर. घबड़ाए मित्रों ने समाजसेवी महोदय के मुंह से निकलते कानून को हाथ से बंद किया और बाहर ले गए. सुधारने चले दोनों बंधु प्रतिष्ठा जाने के डर से खुद ‘सुधर’ गए थे.

तबतक पैरवियों का एक बडा दौर चल चुका था. हमलावर कर्मचारियों की रिश्तेदारी सत्तासीन बीजेपी के एक नेताजी से निकल आई. कर्मचारी खुद भी सत्ताधारी पार्टी के प्रचार में हिस्सा लेते थे. मौजूदा भीड़ समझ गई थी कि अब न्याय नहीं मिलेगा. किसी तरह दोनों बंधुओं के पिता को मामला वापस लेने और समझौता करने के लिए समझा लिया गया. जो झगड़ा व्यवस्था के अत्याचार और दमन का था. सरकारी गुंडागर्दी और अकड़ का था वो धीरे से दो लोगों के झगड़े में बदल दिया गया था.

डॉक्टर साहब को परिवार सहित रवाना कर दिया गया था. बिजली कर्मचारी और नेताजी थानेदार के साथ बैठकर चाय पीने लगे. सुबह मीडिया में खबर भी आ गई . मामला वैसा ही है. डॉक्टर साहब समझ नहीं पा रहे क्या करें.

ये एक सामान्य घटना होते हुए भी सामान्य नहीं है . ये घुटन है समाज में कानून के भरोसे रहने वाले और अपने ही पैसे से चलने वाले सरकारी विभागों के सही से चलने की उम्मीद करने वाले नागरिकों की . इस मामले से पता चलता है कि लोकतंत्र सिर्फ सोशल मीडिया तक है या राष्ट्रीय विमर्ष तक. प्रतिष्ठा और ईमानदारी सत्ता पर कायम नेता और कर्मचारियों की दासियों से ज्यादा कुछ नहीं. जागरुकता के लिए शेयर करें

बस थोड़ा इंतज़ार..

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