अहंकारी सरकार से जीत का इंतज़ार करते-करते हार गए नीरज

अहंकारी सरकार से जीत का इंतज़ार करते-करते हार गए नीरज

गीतकार और कवि गोपालदास नीरज ने जितनी हिंदी की सेवा की उतना ही हिंदीवादियों ने उन्हें निराश किया. नीरज़ अपने जीवन के आखिरी पल तक योगी आदित्यनाथ से एक उम्मीद लगाए बैठे रहे. उन्होंने कहा कि यश भारती पेंशन लिए बगैर वो दुनिया से वापस नहीं जाएंगे. योगी सरकार ने उनकी पेंशन बंद कर दी थी.

नीरज पूर्व प्रधानमंत्री अटल विहारी वाजपेयी के उसी डीएवी कॉलेज में पढ़े थे  जो कानपुर में है. जब वाजपेयी प्रधानमंत्री बने तो नीरज यह बात फख्र से लोगों को बताया करते थे. समाजवादी सरकार में राजभाषा संस्था का अध्यक्ष बनाए गए नीरज के संबंध राज्यपाल राम नाईक से भी रहे.

नीरज को वाजपेयी से भावनात्मक लगाव भी था वो यह भी कहते कि उनकी कुंडली और अटल बिहारी वाजपेयी की कुंडली में बहुत मामूली अंतर है. इसी अंतर ने अटल बिहारी वाजपेयी को प्रधानमंत्री बनाया है. नीरज अपनी आजीविका के लिए डीएवी कालेज में टाइपिस्ट की नौकरी भी करते थे. अटल बिहारी नीरज के सीनियर थे. बाद में वाजपेयी ने देश की राजनीति में सर्वोच्च स्थान हासिल किया. इधर नीरज को समाजवादी पार्टी की सरकार ने पद और सम्मान से नवाजा. लेकिन नीरज ने स्वयं को पहले साहित्यकार माना.

कुछ समय पहले प्रदेश के राज्यपाल राम नाईक नीरज के अलीगढ़ के जनकपुरी स्थित आवास पर पहुंचे. नीरज किसी भी राजनीतिक और सामाजिक मुद्दे पर बेबाक होकर बोलते. जब सपा सरकार ने लैपटाप वितरण की योनजा शुरू की तो उन्होंने तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को पत्र लिखा और सलाह दी कि वह लैपटाप बांटने की बजाय स्कूलों में कंप्यूटर लैब स्थापित करा दें. यह अधिक लाभकारी होगा.

इसी तरह जनसंख्या नियंत्रण के लिए प्रधानमंत्री मोदी को पत्र लिख डाला. यश भारती प्राप्त गणमान्य जनों को पेंशन रोक दिए जाने पर उन्होंने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को भी पत्र लिखा और पेंशन जारी रखवाने की मांग की. कुछ दिनों पहले ही उन्होंने कहा था कि जब तक मेरी यश भारती की पेंशन बहाल नहीं हो जाती. मैं इस दुनिया से जाने वाला नहीं हूं. लेकिन सत्ता की ताकत से नीरज का ये इरादा कैसे जीतता. अहंकारी सरकार को साहित्यकार की भावनाएं कैसे समझ आती. अपनी जीत का इंतज़ार करते करते आज नीरज हार गए.

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