2018 का लेख बताएगा मोदी की 2019 की मुश्किल, जीतना न होगा आसार

जब ये लेख लिखा गया तब मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, और राजस्थान में बीजेपी की सरकार थी. और इस पत्रकार ने लिख इसकी भविष्यवाणी कर दी थी. अब 2019 के लिए ये लेख आंखें खोलने वाला साबित हो सकता है.

कभी कभी कुछ बातें कहना जल्दबाज़ी माना जाता है, लेकिन कभी कभी कुछ बातें जल्द ही पता भी लगने लगती हैं. आप मानें या न मानें लेकिन पीएम मोदी के 2019 में अवसान की झलक अभी से दिखने लगी है. एक के बाद एक संकेत दिखाई दे रहे हैं कि मोदी की विदाई का समय आ गया है. 2019 के चुनाव से पहले कोई चमत्कार हो जाए तो बात अलग है लेकिन मोदी के लिए अब रास्ता आसान नहीं हैं.

एक के बाद एक चुनावों में हार

11 सीटों पर हुए उपचुनाव में बीजेपी के हाथ सिर्फ एक सीट लगी है. मेघालय में कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी बन गई है और कैराना में जिन्ना पर गन्ना भारी तो पड़ा ही ये भी संदेश गया कि सत्ताधारी पार्टी भी उपचुनाव हार गई. आम तौर पर ऐसी मिसालें कम ही मिलती हैं कि सत्ता में बैठी पार्टी हारे. बीजेपी की ये हार पूरे भारत के अलग अलग हिस्सों में हुई है. इसलिए संदेश साफ है कि मेघालय से कर्नाटक तक और यूपी से महाराष्ट्र तक बीजेपी के प्रति जनता ने रियायत नहीं बरती.

सहयोगी पार्टियों का रवैया

बिहार के नितीश कुमार, आंध्र के चंद्रृबाबू नायडू, तेलंगाना के चंद्रशेखर राव, महाराष्ट्र के शरद पवार, मोदी से दूरियां बना चुके हैं. बाकी सहयोगी भी इस तलाश में हैं कि 2019 से पहले मोदी से अलग राह चुन ली जाए ताकि उनके जहाज में साथ गर्क न होना पड़े.

आरएसएस का बदलता रुख

इतिहास गवाह है कि आरएसएस बदलती हवा का रुख वक्त से बहुत पहले झांक लेती है. जब अंग्रेज़ मजबूत थे तो संघ ने उनकी बताई पोशाक को स्वीकार कर लिया. इंदिरागांधी ने इमरजेंसी लगाई तो उन्हें सलाम कर लिया अपने कार्यक्रमों में शक्तिशाली रहे नेहरू और इंदिरा को बुलाते रहे. जब राष्ट्रवाद की बयार चली तो संघ ने झट से उस राष्ट्रीय ध्वज को अपने मुख्यालय पर फहरा दिया जिसे वो 1947 से ही अपना मानने से इनकार करती आ रही थी.

अब प्रणव मुकर्जी को बुलाकर संघ फिर से कट्टरवादियों से दूरियां बनाने में लगी है. सिर्फ प्रणव मुकर्जी को बुलाने की बात होती तो नज़रअंदाज़ किया जा सकता था लेकिन संघ वो सब भी कर रही है जिसका वो विरोध करती थी. आरएसएस से जुड़े संगठन की ओर में मुंबई में इफ्तार पार्टी का आयोजन किया जा रहा है. मुस्लिम राष्ट्रीय मंच के राष्ट्री य संयोजक विराग पचपोरे इसके आयोजक हैं. उनके मुताबिक इफ्तार में तकरीबन 30 देशों के महावाणिज्य दूत शिरकत करेंगे. प्रणव मुकर्जी को बुराने के मामले में आरएसएस के पांचजन्य ने जो संपादकीय लिखा है वो भी साफ कहता है कि उसे कांग्रेस से दूरी कम करनी है.

2019 का इशारा

2014 की धमाकेदार जीत के साथ सत्ता में आए मोदी की हालत अभी ही खराब है. संसद में पार्टी अल्पमत में आ गई है. कुछ और सहयोगी दल भी साथ छोड़ते हैं तो स्थिति और खतरनाक हो सकती है लेकिन पार्टी के लिए इससे ज्यादा चिंताकी बात है 2014 के प्रदर्शन को दोहराना. पिछले लोकसभा चुनाव में बीजेपी के पास 80 में से 73 सीटें थीं. अगर विपक्ष एक होता है तो ये संख्या 50 से ज्यादा नहीं होगी. राजस्थान में पार्टी के पास लोकसभा 25 सीटें हैं. वहां लेकिन वहां हालत अब पतली हो चुकी है. ज्यादा से ज्याद 15 सीटों की उम्मीद खुद पार्टी के नेताओं को नहीं है.

मध्यप्रदेश में पार्टी के पास 29 में से 27 सीटें हैं. हालत इतनी खराब है कि 20 मिल जाएं तो भी चमत्कार होगा, महाराष्ट्र में शिवसेना के साथ मिलकर बीजेपी को 41 सीटें मिली थीं. 18 सीटों वाली शिवसेना उससे अलग हो चुकी है. 2019 में अगर वो अलग चुनाव लड़ती है तो बीजेपी की 23 सीटों पर भी बुरा असर पड़ेगा मतलब वहां से भी दस-बारह से ज्यादा सीटें मिलना बडी बात होगी. कर्नाटक में भी बीजेपी को 28 में से 17 सीटें मिली थीं. इस बार ज्यादा से ज्यादा 15 सीटें मिलेंगी क्योंकि सरकार में कांग्रेस और जेडीएस हैं जाहिर है दोनों मिलकर ही लड़ेंगे.

सबसे अहम गुजरात है जहां बीजेपी के पास सभी 26 लोकसभा सीटें थीं. हम सब जानते हैं कि विधानसभा चुनाव में गुजरात बीजेपी के हाथ से निकलते निकलते रह गया. वहां उसका वोटशेयर काफी गिरा है. जानकारों का कहना है कि बीजेपी अधिकतर 17 सीटें ही ला सकती है.

छत्तीसगढ़ में रमनसिंह सरकार के खिलाफ लंबे समय तक सत्ता में रहने के कारण बेहद नाराज़गी है. वहां पार्टी के पास सभी दस सीटें हैं लेकिन इस बार एक भी मिल जाए तो बड़ी बात होगी. बिहार में भी पार्टी की मौजूदगी बेहद जबरदस्त है. हाल में आरजेडी की वापसी और नितीश की बीजेपी से दूरियां कुछ और समीकरण बता रही हैं. पार्टी की बिहार में 22 सीटें थीं.

इस बार वहां भी मामला 15 के आसपास ही ठहरता लगता है. इसी तरह असम में 14 में से सात सीटें रखने वाली बीजेपी का प्रदर्शन शायद पहले जैसा न हो. वहां भी दो चार सीटें तो कम होनी ही होनी हैं. हो सकता है कि कुछ लोग इससे सहमत न हों लेकिन 2014 से तुलना करें तो मोदी का जुनून काफी कम हुआ है. बीजेपी के कड़े समर्थक भी अब कह रहे हैं कि मोदी हार सकते हैं लेकिन उनके पास विकल्प नहीं. लेकिन जनता जब हराने पर आती है तो विकल्प बगैरह की बाते छोटी हो जाती है. जब इंदिरा गांधी को लोगों ने गद्दी से हटाया था तो कहा जाता था कि वो भारत का पर्याय बन चुकी हैं .इंडिया इज इंदिरा इंदिरा इज इंडिया इसके बावजूद मोदी को पटखनी मिली.

ये लेख आप इंडिया टुडे ग्रुप के ब्लॉग आईचौक पर भी पढ़ सकते हैं. लेख पत्रकार गिरिजेश वशिष्ठ का है