मोदी राज में महिलाओं से दफ्तरों में बदसलूकी के मामले 54% बढ़े, योगी की यूपी का हाल सबसे खराब

कार्यस्थल और दफ्तरों में महिलाओं के उत्पीड़न के मामले में उत्तर प्रदेश में स्थिति सबसे गंभीर है. उत्तर प्रदेश और दिल्ली के बाद छह राज्य ऐसे हैं जहां उत्पीड़न के 100 से ज्यादा केस दर्ज हुए हैं. उत्तर प्रदेश की तुलना में बिहार में स्थिति बेहतर कही जा सकती है.

देश में कार्यस्थल और दफ्तरों में महिलाओं से बदसलूकी और यौन उत्पीड़न के मामले 54% तक बढ़ गए. 2014 में  371 मामले सामने आए जो 2017 तक बढ़कर 570 पर पहुंच गए. इस साल जुलाई तक ऐसे 533 नए केस सामने आए हैं. महिलाओं से यौन उत्पीड़न के ये आंकड़े राष्ट्रीय महिला आयोग (एनसीडब्ल्यू) को मिली शिकायतों से सामने आए हैं. हकीकत में ऐसे केसों की संख्या कहीं ज्यादा हो सकती है.

एक मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, नेशनल स्टॉक एक्सचेंज फिफ्टी (निफ्टी) में सूचीबद्ध कंपनियों में वित्त वर्ष 2017-18 में यौन उत्पीड़न की 588 शिकायतें सामने आईं. इनमें सबसे ज्यादा 244 शिकायतें आईटी सेक्टर की कंपनियों से जुड़ी थीं. सबसे ज्यादा 101 केस विप्रो, 99 केस आईसीआईसीआई बैंक, 77 केस इंफोसिस और 62 केस टीसीएस से सामने आए थे. हालांकि, बड़ी कंपनियों में अच्छी बात ये है कि ऐसी शिकायतों पर तुरंत एक्शन लिया जाता है. निफ्टी से जुड़ी छोटी कंपनियों के मामले में बीते वित्त वर्ष में सिर्फ 2 से 3 फीसदी शिकायतों का ही निपटारा नहीं हो पाया था.

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़े बताते हैं कि दफ्तर के अलावा नौकरी या काम से जुड़ी अन्य जगहों पर भी महिला कर्मचारियों को बदसलूकी का शिकार होना पड़ता है. बीते दो साल में ऐसे मामले 26% तक बढ़े हैं. 2014 में कार्यस्थल पर महिलाओं के साथ बदसलूकी के 526 मामले दर्ज हुए थे. इनमें से 57 मामले दफ्तर में सामने आए, वहीं 469 मामले अन्य जगहों पर सामने आए. 2016 में इन केसों की संख्या 665 रही थी. इनमें 142 मामले ऑफिस में और 523 मामले ऑफिस के काम से जुड़ी दूसरी जगहों पर सामने आए.

बार एसोसिएशन ऑफ इंडिया के एक सर्वे के मुताबिक 70% से ज्यादा महिला कर्मचारी यौन उत्पीड़न की शिकायत दर्ज नहीं करातीं. यह तथ्य भी सामने आया कि ज्यादातर कंपनियां यौन उत्पीड़न के मामले में गंभीर रुख नहीं अपनातीं. सर्वे में 65% से ज्यादा महिलाओं का मानना था कि ज्यादातर मामलों में जांच के लिए बनी आंतरिक शिकायत समिति पारदर्शिता और गंभीरता नहीं बरततीं. महिलाएं नौकरी गंवाने के डर, प्रतिष्ठा और सीनियर के ज्यादा ताकतवर होने की वजह से उत्पीड़न के खिलाफ आवाज ही नहीं उठातीं.