बातों का करंट लगाने वाले जैन मुनि तरुण सागर का निधन

दिगंबर जैन मुनि तरुण सागर ने शनिवार सुबह देह त्याग दी. वे 51 साल के थे. 20 दिन पहले उन्हें लिवर का रोग सामने आया था , जिसके कारण वह बहुत कमजोर हो गए थे. सेहत में सुधार ना होने की वजह से उन्होंने खाना-पीना छोड़ दिया था. उनका असली नाम पवन कुमार जैन था. मध्यप्रदेश के दमोह जिले के गुहजी गांव में उनका जन्म 26 जून 1967 को हुआ था.

उनकी मां का नाम शांतिबाई जैन और पिता का नाम प्रताप चंद्र जैन था. कहा जाता है कि उन्होंने 14 साल की उम्र में 8 मार्च 1981 को घर छोड़ दिया था. उनकी शिक्षा दीक्षा छत्तीससगढ़ में हुई.

अपने क्रांतिकारी प्रवचनों की वजह से तरुण सागर को क्रांतिकारी संत का तमगा मिला हुआ था. वे अपने भाषणों में शाकाहार का प्रचार करते थे और बीच बीच में उत्तेजना से भर जाते थे इसी वजह से उन्हें और भी पहचान मिली. उन्हें मध्यप्रदेश शासन ने 6 फरवरी 2002 को और गुजरात सरकार ने 2 मार्च 2003 को राजकीय अतिथि का दर्जा दिया था. जैन मुनि ने कड़वे प्रवचन नाम से एक बुक सीरिज शुरू की थी. जिसके लिए वह काफी चर्चित रहते थे.

वह सांसारिकता के बीच रहकर भी लोगों को अध्यात्म के दर्शन कराते थे. रोजमर्रा के जीवन में आने वाले घुमावदार पड़ावों और उनकी चुनौतियों से जूझने के बेहद आसान तरीके जो उनके पास था उन्हें लोगों को मुहैया करवाता थे. उनके शब्दों और वाणी में एक आग थी. इस आग की वैचारिक अभिव्यक्ति का दायरा उन्हें जैन समाज के दायरे से बाहर निकालकर उनकी दुनिया को व्यापक बना देता था.

आज दोपहर 3 बजे दिल्ली मेरठ हाइवे पर स्थित तरुणसागरम तीर्थ में उनका अंतिम संस्कार किया जाएगा. यात्रा सुबह 7 बजे राधेपुरी दिल्ली से प्रारंभ होकर 28 किलोमीटर दूर तरुणसागरम पर पहुंचेगी.