“बेरोज़गार न होते तो चौकीदार थोड़े ही होते साहब”

देश भर में चौकीदार पर राजनीति चल रही है. चौकीदार शब्द का जमकर महिमामंडन हो रहा है. पर इस राजनीति में चौकीदार शब्द के इस्तेमाल से थोड़ा ही सही चौकीदारों का भला ज़रूर हुआ है. चौकीदारों की समस्या पर भी दबे छिपे बात हो रही है. बीबीसी ने बाकायदा चौकीदारों से बात की है.

“मैं इस मार्केट की सुरक्षा में तैनात हूं. चौकीदारी का मतलब है यहां नज़र रखना और जहां तक मेरी नज़र जाती है उसकी रखवाली करना. कुछ ग़लत होता है तो उसकी रिपोर्ट देना. बैठे रहना या सो जाना चौकीदारी नहीं है, बल्कि अपनी ज़िम्मेदारी निभाना ही चौकीदारी है. यहां जो भी कुछ ग़लत होगा उसका मैं ही ज़िम्मेदार हूं.”

28 साल के जितेंद्र सिंह कोरी उत्तर प्रदेश के फ़िरोज़ाबाद से नोएडा आकर सुरक्षा गार्ड का काम करते हैं. वो यहां महीने के तीसों दिन, हर रात, 12 घंटे सुरक्षा में तैनात रहते हैं.

उनकी इस मेहनत के बदले महीने के आख़िर में नौ हज़ार रुपए नक़द मिलते हैं. अगर किसी मजबूरी में कोई छुट्टी कर ली तो उस दिन का दोगुना वेतन गंवाना पड़ता है. उन्हें याद नहीं है कि उन्होंने आख़िरी बार काम से छुट्टी कब ली थी.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में अपने नाम के साथ चौकीदार लगा लिया. सिर्फ़ मोदी ही नहीं बल्कि उनकी पार्टी के अन्य मंत्रियों और कार्यकर्ताओं ने भी ऐसा ही किया. देश भर में ‘मैं भी चौकीदार हूं’ अभियान चलाया गया है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ऐसा विपक्षी कांग्रेस के ‘चौकीदार ही चोर’ है चुनावी नारे के जबाव में कर रहे हैं. लेकिन, उनके इस क़दम ने जितेंद्र सिंह जैसे चौकीदारों को कुछ देर के लिए ही सही, गर्व ज़रूर महसूस कराया है.  जितेंद्र सिंह कहते हैं, जब अख़बार में पढ़ा कि प्रधानमंत्री ने अपने नाम के आगे चौकीदार लगाया है तो बहुत गर्व हुआ.

लेकिन जब उनसे पूछा गया कि क्या वो अपने काम से ख़ुश हैं तो उन्होंने कहा, “बेरोज़गार हूं, इसलिए चौकीदार हूं. अगर और कोई बेहतर काम मिलता तो ये काम नहीं करता. यहां मेहनत का मोल नहीं है.”

वो कहते हैं, “हमारे फ़िरोज़ाबाद में चूड़ियों का काम होता है, दिन भर काम करो तो डेढ़-दो सौ रुपए बनते हैं. इतने में परिवार नहीं चलता इसलिए घर से बाहर निकले और सुरक्षा गार्ड की नौकरी की क्योंकि मेरे पास और कोई टैलेंट भी नहीं है. सिक्योरिटी सिर्फ़ ज़िम्मेदारी का काम है, और ज़िम्मेदारी हम निभा लेते हैं.”

जितेंद्र सिंह कहते हैं, “दूर से देखने से ये आसान काम लगता है लेकिन जो चौकीदारी करता है वो ही जानता है कि ये कितने ज़ोख़िम का काम है. हम सारी रात ड्यूटी करते हैं, हमारे साथ कुछ भी हो सकता है.” भले ही प्रधानमंत्री खुद को चौकीदार कहें लेकिन चौकीदार सबसे दीन हीन प्राणी है. उसका शोषण होता है. ओवरटाइम ड्यूटी करनी पड़ती है. और 12 घंटे की शिफ्ट के बाद भी हफ्ते में एक भी छुट्टी नहीं मिलती.

वो कहते हैं, प्रधानमंत्री मोदी ने अपने आपको चौकीदार कहा है, अब जब चौकीदार नाम रख ही लिया है तो चौकीदारों और बेरोज़गारों के बारे में वो कुछ सोचें भी.

23 साल के दीपक कुमार झा बिहार के भागलपुर से आकर सुरक्षा गार्ड की नौकरी कर रहे हैं. उन्हें और कोई बेहतर काम नहीं मिला तो ये काम कर रहे हैं. जितेंद्र की ही तरह वो भी बिना छुट्टी रोज़ाना बारह घंटे ड्यूटी करते हैं.

वो कहते हैं, “चौकीदारी का काम कर रहे हैं मज़बूरी में. महीने में नौ हज़ार मिलता है, कुछ नहीं बच पाता. हाल ही में बहन की शादी की तो पच्चीस हज़ार का क़र्ज़ हो गया. जो कमाते हैं वो यहीं रहने खाने-पीने में ख़त्म हो जाता है. दो हज़ार रुपए बचते हैं, उससे क्या होगा. क़र्ज़ भी नहीं उतर पाएगा.”

वो कहते हैं, “ये मुश्किल काम है. सारी रात जगना पड़ता है. अगर आठ घंटे की ड्यूटी हो, महीने में चार छुट्टी मिल जाएं तो यही काम अच्छा लगने लगे.”

वो कहते हैं, “बहुत बार कोशिश की, कोई काम नहीं लगा इसलिए रात भर जग रहे हैं. अपने आप को ख़र्च कर रहे हैं.”

60 साल के राम सिंह ठाकुर बीस साल से चौकीदारी कर रहे हैं. उन्होंने मजबूरी में ये काम शुरू किया था और अब भी मजबूरी में ही कर रहे हैं.

राम सिंह को महीने के साढ़े आठ हज़ार रुपए मिलते हैं. बाकी गार्डों की ही तरह उन्हें भी छुट्टी नहीं मिलती. वो कहते हैं, “कंपनी की ओर से कोई सुविधा नहीं मिलती. न बीमा, न पीएफ़, बीमार हो जाओ तो घर भेज देते हैं, कोई वेतन नहीं मिलता.”

राम सिंह कहते हैं, “प्रधानमंत्री ने अपने आपको चौकीदार कहा, अच्छा लगा. उनकी योजनाएं अच्छी हैं. लागू हो जाएं तो और भी अच्छा है.”

बीमार पर काम करने को मजबूर

जब मैं राम सिंह, जितेंद्र और दीपक से बात कर रही थी तो रात के क़रीब दो बज रहे थे. उन्होंने आसपास पड़े गत्ते इकट्ठा करके आग जला ली. ऐसा वो सर्दी से नहीं बल्कि मच्छरों से बचने के लिए कर रहे थे. वो कहते हैं, ‘अगर मच्छर ने काटा और बीमार पड़ गए तो कहीं के नहीं रहेंगे.’

चौकीदारी के काम में गली के कुत्ते उनके साथ रात के पहरेदार हैं. पास ऐसे बैठते हैं जैसे बहुत गहरी दोस्ती हो.

रात के ढाई बजे हैं. नोएडा के ही एक दूसरे कोने में एक निर्माणस्थल के बाहर वेदराम अपनी बंदूक लिए मुस्तैदी से बैठे हैं. मूलरूप से उत्तर प्रदेश के हरदोई के रहने वाले वेदराम 1992 से चौकीदारी का काम कर रहे हैं. लेकिन, आज तक न उनका कोई पहचान पत्र बन पाया है न कोई पीएफ़ खाता है. उन्हें आज भी वेतन नक़द ही मिलता है.

वेदराम कहते हैं, “मैं इतनी बड़ी साइट पर काम कर रहा हूं लेकिन मेरा वेतन है सिर्फ़ 11 हज़ार रुपए है.”

वो कहते हैं, “न हमें कोई छुट्टी मिलती है, न दवा मिलती है. प्रधानमंत्री अच्छा काम कर रहे हैं, उन्होंने हमें सुविधाएं दी होंगी, हम पढ़े-लिखे नहीं हैं इसलिए हमें कुछ मिल नहीं पाता.”

जब मैं वेदराम से बात कर रही थी तब उनके साथ तैनात दूसरे सुरक्षा गार्ड को उल्टी हुई. उन्होंने बताया कि शाम से बीमार हैं, लेकिन छुट्टी लेने पर पैसे कटते हैं इसलिए छुट्टी नहीं ले पाए.

वो बोले, “मजबूरी में चौकीदारी का काम कर रहे हैं. परिवार से दूर हैं. तीज-त्योहार पर भी छुट्टी नहीं मिल पाती है.”

पीएम का चौकीदार कहना पसंद नहीं

अपने आप को महादेव और मोदी का फ़ैन बताने वाले केशव कुमार नोएडा एक्सप्रेसवे पर लगे विज्ञापन एलसीडी स्क्रीन की सुरक्षा में रोज़ाना शाम सात बजे से सुबह सात बजे तक तैनात रहते हैं. बाकी गार्डों की ही तरह वो भी बिना छुट्टी के ड्यूटी करते हैं.

वो कहते हैं, “होली आ रही है लेकिन छुट्टी नहीं मिलेगी, छुट्टी तो क्या वेतन भी टाइम से नहीं मिलता. नौ हज़ार रुपए मिलते हैं, उसमें कुछ नहीं हो पाता है.”

प्रधानमंत्री मोदी के अपने आप को चौकीदार कहने के सवाल पर वो कहते हैं, “प्रधानमंत्री चौकीदार के लायक नहीं होता है. वो देश के बहुत बड़े पद पर हैं, उनके लिए बहुत ज़िम्मेदारी होती है. चौकीदार तो लोग ऐसे ही बोल देते हैं ख़ुद को. प्रधानमंत्री का अपने आप को चौकीदार कहना मुझे बिलकुल अच्छा नहीं लगा.”

वो कहते हैं, “प्रधानमंत्री को हम जैसे लोगों के लिए कुछ करें. जिनका वेतन कम है, जिन्हें छुट्टी नहीं मिलती, जिनके पास रोजग़ार नहीं है. नौ हज़ार रुपए में घर नहीं चलता है. किसी की सैलरी बारह हज़ार रुपए से कम न हो, वो ऐसी व्यवस्था कर दें.”

केशव कहते हैं, “सरकार ने जो नियम क़ानून बनवाए हैं, उन्हें लागू करवाए. होली-दिवाली पर ही नहीं, सरकार वैसे भी छुट्टी दिलवाए.”

‘लगा रहा है बड़ा काम कर रहे हैं’

नोएडा के सेक्टर 18 के बाज़ार की सुरक्षा में तैनात राम अवतार ने हाल ही में ये नई ड्यूटी शुरू की है. पांच बेटियों के पिता राम अवतार कुछ महीने चौकीदार की नौकरी करते हैं और कुछ महीने अपने घर पर रहकर परिवार की देखभाल करते हैं.

राम अवतार की तीसरी बेटी की शादी अगले महीने होनी है. उन्हें चिंता है, वेतन के समय पर मिलने की. वो कहते हैं कि उन्होंने नई कंपनी में नई ड्यूटी शुरू की है तो वर्दी का पैसा वेतन में से कट जाएगा. बेटी की शादी है, इस पैसे की कमी महसूस होगी.

प्रधानमंत्री के अपने आप को चौकीदार कहने के बारे में उन्हें कोई जानकारी नहीं है. वो कहते हैं, “इस सरकार में हमारे राशन कार्ड बन गए हैं. खाना सरकारी राशन से बन जाता है तो परिवार का पेट भर रहा है. इसके अलावा किसी सरकारी योजना का फ़ायदा हमें नहीं मिला है. किसी और योजना का हमें पता भी नहीं है.”

सुधन और निरंजन सिक्योरिटी गार्ड का काम करते हैं.

27 साल के निरंजन और 21 साल के सुधन कुमार एक बड़ी रिहायशी सोसायटी के चौकीदार हैं. काम के बीच में बड़ी मुश्किल से समय निकालकर वो दोपहर का खाना खाने निकले हैं. बात करने के लिए उनके पास सिर्फ़ दो ही मिनट का वक़्त है.

सुधन कहते हैं, “मोदी जनता की सेवा कर रहे हैं इसलिए अपने आप को चौकीदार कहते हैं. हम भी सुरक्षा करके जनता की सेवा कर रहे हैं. मोदी ने अपने आप को चौकीदार कहकर अपनी बड़ी सोच दिखाई है. अब हमें भी लग रहा है कि हम कोई बड़ा काम कर रहे हैं.”

सुधन और निरंजन दोनों का ही ये कहना था कि वो मजबूरी में चौकीदार हैं और बेहतर मौक़ा मिलते ही ये काम छोड़ देंगे. वो कहते हैं कि 12 घंटे की ड्यूटी और आने-जाने में ख़र्च हुए समय के बाद वो न ठीक से खाना बना पाते हैं न सो पाते हैं. न तीज-त्योहार पर परिवार से मिल पाते हैं. दूसरा कोई काम नहीं है इसलिए ये काम कर रहे हैं.

गांवों में रोज़गार की कमी

मैंने दर्जनों ऊंची रिहायशी इमारतों की सुरक्षा में तैनात क़रीब पचास और सुरक्षा गार्डों से बात की. सबकी कहानी बिलकुल एक जैसी है. गांव में रोज़गार न होने की वजह से राजधानी को कूच किया. यहां बिना छुट्टी रोज़ाना बारह घंटे काम करते हैं और वेतन दस से बारह हज़ार रुपए मिलता है.

एक सिक्योरिटी कंपनी के एरिया मैनेजर ने अपना नाम न प्रकाशित करने की शर्त पर बताया कि उनके यहां ग्रेजुएट युवा भी गार्ड की नौकरी के लिए आते हैं. लेकिन वो इसकी वजह बेरेज़गारी को नहीं मानते. वो मानते हैं, “जो कंपीटशन के ज़रिए अच्छी नौकरी नहीं पाते, या जो निजी कंपनियों में अच्छे से इंटरव्यू नहीं दे पाते वो ही युवा गार्ड बनने आते हैं. “

कार्य के घंटों और छुट्टी न मिलने के सवाल पर वो कहते हैं, “आप किसी भी सिक्योरिटी कंपनी में चले जाएं, नौकरी 12 घंटे प्रतिदिन की ही होती है. छुट्टी बिना वेतन के होती है. लेकिन, हम यूपी की न्यूनतम मज़दूरी का पालन करते हैं. इसलिए ही वेतन 12 हज़ार के करीब बैठता है. ज़रूरत पड़ने पर छुट्टी दी जाती है लेकिन इसका वेतन नहीं मिलता है.”

एक रिहायशी सोसायटी के सिक्योरिटी सुपरवाइज़र गजराज कहते हैं, “ज़िम्मेदारी, एक चौकीदार की सबसे बड़ी चुनौती है.”

प्रधानमंत्री मोदी को अपने आप को चौकीदार कहने के सवाल पर वो कहते हैं, “पिछले चुनाव में उन्होंने हमसे जो वादे किए थे, उन पर वो तत्पर नहीं रहे. प्राइवेट संस्थाओं के श्रमिकों के काम को रोज़ाना आठ घंटे करना और साप्ताहिक छुट्टी दिलाना और अकुशल श्रमिकों को न्यूनतम वेतन पंद्रह हज़ार रुपए करने का वादा उन्होंने किया था. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. हम अब भी बारह घंटे रोज़ाना बिना छुट्टी के काम कर रहे हैं.”

वो कहते हैं, “राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए प्रधानमंत्री चौकीदारी करते हैं. इस दिशा में उन्होंने बहुत पैसा ख़र्च भी किया है. लेकिन, बेरोज़गारी और ग़रीबी वो ख़त्म नहीं कर पाए हैं. जब तक ये ठेकेदारी प्रथा ख़त्म नहीं होगी, चौकीदार ग़रीब ही रहेगा, उसकी मेहनत की लूट होती रहेगी.”

जब गजराज ये सब बोल रहे थे, तब पास ही बैठे उनकी कंपनी के एरिया मैनेजर के चेहरे के भाव बदल रहे थे. वो उन्हें बीच में हो रोक देना चाहते थे क्योंकि मेहनत की जिस ठेकेदारी को हटाने की गजराज बात कर रहे थे, वो उसी का प्रतिनिधित्व करते हैं.

केंद्रीय श्रम मंत्री बंडारू दत्तात्रेय ने सितंबर 2016 में कहा था कि सरकार सुरक्षा गार्डों को कुशल कर्मचारियों की श्रेणी में लाने पर विचार कर रही है और ऐसा करने पर उनका न्यूनतम वेतन 15 हज़ार रुपए प्रति माह हो जाएगा.

इसके अलावा सशस्त्र गार्डों और सुपरवाइजरों को अति कुशल श्रमिक मानने और उनका वेतन कम से कम 25,000 रुपए मासिक करने का वादा भी सरकार ने किया था. एक अनुमान के मुताबिक भारत में पचास लाख से अधिक सिक्योरिटी गार्ड हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने आप को चौकीदार तो कह दिया है लेकिन चौकीदारों से किया गया वादा पूरा होना अभी बाक़ी है.

हमने सुरक्षा गार्डों की हालत के बारे में नोएडा में तैनात डिप्टी लेबर कमिश्नर प्रदीप कुमार से बात करने की कोशिश की. लेकिन उन्होंने हमारे किसी भी सवाल का जबाव देने से इनकार कर दिया. हमने लिखित में भी उन्हें सवाल भेजे, जिनका उन्होंने कोई जबाव नहीं दिया है.

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