ग्वालियर का पचास साल पुराना दशहरा, एक बच्चे की नज़र से

दशहरे पर सुबह की शुरुआत अक्सर माताजी के जगाने से होती थी. जाग गए तो भी इंतजार रहता था कि मोहल्ले में एक शख्स आवाज़ लगाता हुआ आएगा “नीलकंठ के दर्शन कर लो” वो घर के दरवाज़े पर आता और दस पैसे लेकर नीलकंठ दिखा देता. हम शहर में रहते थे तो बहुत ज्यादा तरह के पक्षियों को नहीं देख पाते थे. गौरैया, कौआ, कबूतर और बुलबुल आया करते थे. ऐसे में रंगबिरंगा नील कंठ काफी आकर्षित करता था. दशहरे पर रामलीला मैदान में खास तैयारी होती थी. रामलीला में लगने वाली दुकानों से अलग कई और दुकानें उस दिन दिखाई देती हैं.

काठ की एक चौकोर सी दूकान सिर पर लेकर चूरन वाला घूमता था. पांच पैसे में चूरन दे देता पन्द्रह पैसे दें तो वो चूरन में आग लगाकर देता था. एक कांच की सलाई छोटी सी कांच की शीशी में रखे किसी तरल में डुबोता और चूरन की पुडिया के ऊपर कोई सफेद सा पावडर डालकर उसे छुआ देता. चूरन बारूद सा जल उठता.

पान की दूकनों की खास तैयारी हुआ करती थी. दुकानों के सामने पानी छिड़का जाता . लाइटिंग होती दुकान तोड़ी सड़क पर आ जाती बड़ी हो जाती और लाउड स्पीकर भी लग जाता. चार आने का बिकने वाला पान दशहरे पर दस पैसे का बिका करता था वो भी आवाज लगा लगा कर. बच्चे सिर्फ मीठा पान पसंद करते थे और उसमें गुलकंद डाला जाता था. लाल पीली चेरी तब चलन में नहीं आई थी. पान में सौंफ भी होती और स्टार नाम का एक खुशबूदार पावडर भी. ग्वालियर में देसीपान खाने का रिवाज़ था. हां दशहरे पर पान इसलिए ज्यादा बिका करता था क्योंकि इस दिन बड़े बच्चों को पान खाने के लिए पैसे देते थे. कोई दस पैसे देता तो कोई पन्द्रह पैसे. चवन्नी मिल जाए तो लॉटरी लग जाती थी. लेकिन ऐसे दिलदार कम ही मिला करते थे.

दशहरे के दिन नीलकंठ के दर्शन करने के बाद जब आप घर से बाहर निकलते थे तो गली में भरपूर चहल पहल होती थी. अब की तरह नीरस लोग नहीं थे. सब एक दूसरे से बात करते हुए जाते और आते थे. और इसी चहल पहल के बीच हमारी उम्र के बच्चे पड़ोस में सोना बांटा करते थे.  ये सोना इमली जैसी छोटी छोटी पत्तियां होती थीं जिनपर सुनहरा रंग लगा दिया जाता था. बाद में पता चला कि ये शमी का पेड़ होता है. सोना बांटना बड़ों के लिए किसी कथा पुराण का हिस्सा रहा होगा लेकिन हमारे लिए ये बड़ों से मिलने जुलने का तरीका था. जाते . सोना देते, पांव छूते और चले आते. कभी कभी पैसे भी मिल जाया करते थे लेकिन कभी कभी.  बाद में हमने अपने कोर्स की किताबों में पढ़ा कि कोई राजा था जिसने अपना सारा धन इसी पेड़ पर बैठकर बांटा था.

अपना दशहरा ऐसे ही व्यस्त बीतता था लेकिन दिन का बड़ा हिस्सा अभी बाकी है. शाम होते ही बच्चे गली के नुक्कड़ पर इकट्ठा हो जाते . गली के बाहर से एक बड़ा दशहरे का जुलूस निकलता. इस जुलूस में कई तरह के रामायण के पात्र सजे बैठे होते और इस जुलूस के स्वागत के लिए सडकों को लाइट से सजा दिया जाता था. जुलूस निकलता और बच्चे बड़े सब खड़े खड़े देखते रहते.  जुलूस की सबसे आखिरी झांकी सबसे रोचक होती थी ये थी राम रावण के युद्ध की . दो ऊंटे ऊंचे खुले रथ होते थे एक पर रावण होता था और उससे काफी दूर एक और रथ होता था इसमें राम लक्षमण और वानर सेना होती थी. इन दोनों रथों पर सवार पात्र लगातार एक दूसरे पर पतले वाले सरकंडों के तीर चलाते रहते थे. वही सरकंडे जो कुल्फी में डंडी के तौर पर इस्तेमाल होते हैं. जब इतने तीर चलते थे तो बच्चों को भी मिल जाते थे. हालांकि बच्चों के लिए ये तीर नये नहीं होते थे क्योंकि रामलीला शुरू होते ही खिलौने वाला बांस का बना धनुष बेच जाया करता था जिसपर पतले तार की प्रत्यंचा होती. बांस गुलाबी, हरे और नीले रंगों से रंगा जाता था और उसे पन्नियां लपेटकर सजाया जाता था  सरकंडे के तीर उसी से छोड़े जाते थे. हमारे भाई जी तो बड़ा बांस का धनुष खुद ही बना लेते थे बांस की खपच्ची चौड़ी होती और उसके बीच में एक छेद भी होता सुतली की प्रत्यंचा वाले इस धनुष के हम बहुत मुरीद थे. भाई जी की इस कला के हम बहुत बड़े फैन होते थे. जैसा अक्सर बच्चे अपने बड़ों के होते थे.

शाम को जब दशहरे का जुलूस वापस रामलीला मैदान पहुंच जाता तो वहां रामलीला होती . राम रावण का युद्ध होता आखिर रावण मारा जाता. हमेशा हमारी इच्छा होती थी कि रावण जल्दी मर जाए. रावण मरने के बाद रावण के पुतले जलाए जाते. ऊचे और बड़े पुतले होते थे ठीक वैसे जैसे आजकल हुआ करते हैं. इन पुतलों के सात बाद में आतिशबाज़ी प्रतियोगिता भी होती थी.

हमारे मोहल्ले में बाबू भाई का घर था. मोहल्ले का अकेला मुसलमान घर हम उनके घऱ जाते और पटाखे बनाने का तरीका सीखते. जब आतिशबाज़ी प्रतियोगिता होती तो वहां आग के झरने बनाए जाते थे. बड़ी बडी चकरियां होती थी और हवाई हमला नाम से रॉकेट छोड़े जाते थे आज के स्काई शॉट से कई गुना ऊपर जाने वाले और तेज धमाके की आवाज के साथ फटने वाले ये राकेट करीब पच्चीस पचास एक साथ आसमान में जाते थे इनमें रंगीन रोशनी छोड़ने वाला बारूद भी होता था. ग्वालियर के जाने माने आतिशबाज़ आते लेकिन हमारी इच्छा होती थी कि बाबू भाई  ही जीतें. उनके धमाके को बचपन में अपन परमाणु बम से कम नहीं समझते थे. किसी से भी शर्त लगा सकते थे कि बाबू भाई के धमाके से तेज़ आवाज दुनिया मे किसी चीज़ की होती ही नहीं लेकिन प्रतियोगिता में एक सक्सैना जी जीतते थे . वो हमेशा जीत जाते हमें हमेशा लगता कि आतिशबाज़ी प्रतियोगिता में बेईमानी हुई है.

खैर ये दशहरे के दिन की यादें हैं. ग्वालियर का दशहरा करीब पचास साल पुराना ऐसा ही होता था. कम से कम एक बच्चे की नजर में दशहरा का यही मतलब था. आप सबको बधाई. अपने से छोटों को पान खिलाना और बड़ों को सोना देना उस समाज को बनाता था जिसकी आज बहुत जरूरत है.

आजतक के पत्रकार गिरिजेश वशिष्ठ का संस्मरण, फेसबुक पर प्रकाशित

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