कर्नाटक को लेकर टेंशन में अमित शाह, सोशल मीडिया सेल को मिली ये जिम्मेदारी

कर्नाटक को लेकर टेंशन में अमित शाह, सोशल मीडिया सेल को मिली ये जिम्मेदारी

नई दिल्ली : एक तरफ पार्टी विधायकों का इंतजाम करने में लगी है तो दूसरी तरफ सोशल मीडिया सेल में धड़ा धड़ पार्टी के प्लान बी पर काम चल रहा है.

कर्नाटक में बीजेपी ने सरकार तो बना ली लेकिन 16 विधायकों के इंतजाम में पार्टी के सारे नेता घोड़ खोल रहे हैं. हालात ये हैं कि अब तक बहुमत का आंकड़ा इकट्ठा नहीं हो सका है.

हालात ये हैं कि सुप्रीमो कोर्ट में येदियुरप्पा 112 विधायकों के नाम नहीं दे सके तो कुर्सी के साथ नाक बचाना भी मुश्किल होगा.

सोशल मीडिया सेल के अहमदाबाद के दफ्तर के सूत्रों के मुताबिक अमित शाह की तरफ से एक लाइन का ब्रीफ आया है . अगर फेल होती हैं तो पार्टी को फेल नहीं बल्कि अन्याय का शिकार दिखना चाहिए.

इस ब्रीफ के बाद लगातार वाट्सएप वीडियो और फेसबुक तस्वीरों का इंतजाम किया जा रहा है. टैक्स मैसेज और चुटकुले भी बन रहे हैं.  वो सभी जानकारियां निकाली जा रही हैं जिनसे कांग्रेस के पुराने इतिहास के जरिए ये साबित किया जाए कि कांग्रेस ने बीजेपी का हक एक बार फिर छीन लिया है.

अगर बीजेपी अपनी पीड़ित इमेज बनाती है तो जाहिर बात हैं राहुल गांधी को शातिर दिखाना होगा. ऐसे में सेल में इस बात का ब्रीफ है कि शातिर दिखाना है तो कांग्रेस को दिखाया जाए. राहुल गांधी की इमेज किसी भी तरह ‘पप्पू’ की ही बनाए रखी जानी है. यही वजह है कि पार्टी के सारे हमले कांग्रेस पार्टी पर होंगे.

ऐसा भी नहीं है कि येदियुरप्पा की ऐसी नाक पहली बार कटी हो. इससे पहले जब पहली दफा 2007 में वह मुख्यमंत्री बने थे तो जेडीएस गठबंधन टूटने पर सिर्फ सात दिन कुर्सी तक बैठ सके थे. किस्मत खुद को दोहराती है. कम सीटों के साथ देवगौड़ा अगर पीएम बने थे तो इस बार देवगौड़ा के बेटे कुमारस्वामी भी उसी मुहाने पर खड़े हैं.

लेकिन इस बार टेंशन दूसरी है इसलिए बीजेपी ये बेइज्जती बर्दाश्त नहीं कर सकेगी. आम चुनाव में एक साल भी नहीं बचा है. 2019 के चुनाव से पहले अगर पार्टी की छवि खराब होती है तो दिक्कत होगी. इसलिए हर हाल में इमेज बिल्डिंग पर ज़ोर है.

ये हैं आंकड़े की टेंशन

222 सदस्यीय विधानसभा में बीजेपी के पास 104, कांग्रेस के 78 और जेडीएस के 38 विधायक हैं. जबकि दो विधायक निर्दलीय हैं. बीजेपी को 112 की जादुई संख्या तक पहुंचने के लिए आठ विधायकों की दरकार है. पार्टी को दो निर्दलीयों का साथ मिलने की उम्मीद थी, मगर निर्दलीय विधायक जेडीएस-कांग्रेस के धरने में शामिल होते नजर आए. माना जा रहा के निर्दलीय विधायक बीजेपी के साथ नहीं जाना चाहते. लेकिन धरने में लोगों के शामिल होने का मतलब ये नहीं मानना चाहिए कि विधायक वफादार ही हैं. हो सकता है कि धरने में दिखना बीजेपी की एक ऐसी रणनीति हो जिससे कांग्रेस और जेडीएस को पता ही न चल सके कि गेम क्या है और कौन अमित शाह के प्रभाव में आ चुका है.

सूत्र बता रहे कि बीजेपी जेडीएस-कांग्रेस में सेंधमारी की ताक मे थी, मगर यह आसान नहीं है. क्योंकि पहले से ऐसी आशंका को भांपते हुए कांग्रेस-जेडीएस अपने विधायकों को सुरक्षित रिजॉर्ट में ‘नजरबंद’ करने की तैयारी की है. जाहिर सी बात है कि बीजेपी इन विधायकों तक आसानी से नहीं पहुंच सकती. बीजेपी को कांग्रेस के करीब एक दर्जन लिंगायत विधायकों के समर्थन मिलने की उम्मीद रही. जेडीएस से गठबंधन के मुद्दे पर इन विधायकों के कांग्रेस से बगावत की खबरें थीं, मगर अब तक बीजेपी और लिंगायत विधायकों के बीच कोई सामंजस्य नहीं बन सका है.

दूसरी तरफ कांग्रेस और जेडीएस ने अपने पास बहुमत से ज्यादा सीटें होने का दावा किया है. राज्यपाल को 115 विधायकों की सूची सौंपने की बात सामने आ रही है. जबकि बहुमत के लिए 112 की संख्या ही काफी है. ऐसे में बहुमत का पेंच फंसा होने पर बीजेपी संकट का सामना कर रही है.

पहले भी बना है एक रात का सीएम

कर्नाटक की तरह उत्तर प्रदेश में भी खंडित जनादेश के चलते मुख्यमंत्री की कुर्सी को लेकर मारामारी मच चुकी है. दरअसल राज्य में 1996 में हुए चुनाव में खंडित जनादेश आया. अकेले कोई दल सरकार बनाने में सक्षम नहीं दिखा तो राज्यपाल ने राष्ट्रपति शासन लगा दिया था. बाद में बीजेपी ने बसपा से गठबंधन कर सरकार बनाई थी. इस बीच बसपा ने समर्थन वापस लिया तो फिर कल्याण ने जोड़-तोड़ कर सरकार बनाई और रिकॉर्ड 93 सदस्यीय मंत्रिमंडल बनाया.

बाद मेंराज्यपाल रोमेश भंडारी ने कल्याण सिंह सरकार को बर्खास्त कर दिया और जगदंबिका पाल को शपथ दिलाई. आधी रात में बीजेपी ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया और अगले दिन हाईकोर्ट ने जगदंबिका पाल के मुख्यमंत्री बनने की प्रक्रिया असंवैधानिक घोषित कर दी.

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