मोदी के एक गलत कदम से लड़खड़ा गया देश, लगातार गिरती जा रही है भारत की तरक्की की रफ्तार, नीति आयोग भी दे रहा है गवाही

नई दिल्ली: नोट बंदी का बुरा असर अर्थव्यवस्था पर पड़ना शुरू हो गया था. जाने माने अर्थशास्त्री अरविंद पनगढ़िया ने कहा था तीसरी और चोथी तिमाही में भारत की वृद्धि दर पर इसका बुरा असर पड़ेगा और भारत की प्रगति की रफ्तार पर ब्रेक लगेगा. पनगढ़िया नीति आयोग के उपाध्यक्ष भी हैं. नीति आयोग भारत की योजना बनाने वाली अहम संस्था था और इसके अध्यक्ष खुद प्रधानमंत्री मोदी हैं. नीति आयोग से पहले भारत की अर्थव्यवस्था पर अंतर्राष्ट्रीय रेटिंग एजेंसी फिच भी भारत की रेटिंग गिरा चुकी था उसने कहा था कि भारत की वृद्धिदर अब कम हो जाएगी.

इससे पहले ग्लोबल रेटिंग एजेंसी फिच (Fitch) ने वित्त वर्ष 2016-17 में भारत की जीडीपी ग्रोथ के अनुमान को 7.4 फीसदी से घटाकर 6.9 फीसदी कर दिया था. रेटिंग फर्म ने कहा था कि नोटबंदी के बाद आर्थिक गतिविधियों में गतिरोध आएगा.

एजेंसी ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि भारत सरकार के नोटबंदी के फैसले से पैदा हुए कैश के संकट का असर अक्तूबर-दिसंबर तिमाही की आर्थिक गतिविधियों पर पड़ेगा. सरकार ने 8 नवंबर को नोटबंदी की घोषणा की और 500 व 1000 रुपये के मौजूदा नोटों को चलन से बाहर कर दिया. इस तरह से लगभग 86 फीसदी करंसी एक साथ ही चलन से बाहर हो गई.

फिच ने अपनी रिपोर्ट ‘विश्व आर्थिक परिदृश्य:नवंबर’ में कहा था कि 86 फीसदी बैंक नोटों को चलन से बाहर करने के कदम के कारण आर्थिक गतिविधियों में व्यवधान आया था. इसे देखते हुए भारतीय वृद्धि दर अनुमान में कमी की गई.

इस अमेरिकी एजेंसी ने 2017-18 और 2018-19 के लिए भी अपने वृद्धि दर अनुमान को संशोधित कर क्रमश: 7.7% और 8% कर दिया था. इसके अनुसार, ढांचागत सुधार अजेंडे को एक-एक कर पूरा करने से ग्रोथ बढ़ने की उम्मीद थी. खर्च करने योग्य आय और सरकारी कर्मचारियों के वेतन में लगभग 24 फीसदी बढ़ोतरी से भी इसे बल मिलेगा.

नोटबंदी के बारे में इसमें कहा गया था कि ग्राहकों के पास खरीदारी के लिए कैश नहीं है. सप्लाइ चेन के बाधित होने और किसानों को खाद, बीज खरीदने में दिक्कतों की खबर है. इसमें कहा गया , सबसे महत्वपूर्ण बात तो यह है कि नोटबंदी एक ही बार की जा सकती है. असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले अपनी संपत्ति को छुपाने के लिए नए नोट और दूसरे विकल्पों का इस्तेमाल कर सकेंगे.

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